चाय पर चर्चा

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Discussion over tea

 

पत्रकार दीपक तिवारी

 

कवर्धा की गलियों से लेकर चौक-चौराहों तक… पान ठेला हो या चाय की दुकान—आजकल हर जगह एक ही चर्चा गर्म है। चाय की भाप के साथ उठती है एक कड़वी सच्चाई, जिसे लोग खुलकर तो नहीं, लेकिन दबे स्वर में जरूर बोल रहे हैं।

 

मामला है SDM कार्यालय कवर्धा का…

 

चाय की चुस्कियों के बीच जमीन कारोबार से जुड़े लोग बताते हैं—

 

“भाई, बिना ₹25,000 दिए डायवर्सन होना तो सपना है…”

 

“हर फाइल का अपना रेट है… और डायवर्सन का फिक्स रेट ₹25,000 बताया जा रहा है!

 

इतना ही नहीं, चर्चा यह भी है कि अगर “सेटिंग” नहीं हुई तो फाइल सीधे नस्तीबद्ध यानी ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है।

 

आम आदमी चक्कर लगाता रह जाता है—दफ्तर के, बाबुओं के, अफसरों के… लेकिन काम? वो वहीं का वहीं!

 

त्रुटि सुधार—सबसे बड़ा ‘खेल’

 

गांव से आए लोग बताते हैं कि त्रुटि सुधार के मामले सबसे ज्यादा लंबित हैं।

 

फाइलें “पायलट टेबल” पर महीनों पड़ी रहती हैं…

 

लोग रोज आते हैं, उम्मीद लेकर… और खाली हाथ लौट जाते हैं।

 

“महीना-दो महीना तो सामान्य है, कई लोग 6-6 महीने से चक्कर काट रहे हैं…”

 

“जब तक जेब ढीली नहीं करो, फाइल आगे बढ़ती ही नहीं…”

 

आम जनता में भारी आक्रोश

 

गांव का किसान हो या शहर का आम आदमी—हर कोई परेशान है।

 

जमीन-जायदाद का काम हो तो तहसील और SDM कार्यालय के चक्कर काटते-काटते जूते घिस जाते हैं, लेकिन काम नहीं होता।

 

लोगों का कहना है:

 

“सरकार तो कहती है पारदर्शिता है… लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है!”

 

“अगर पैसा ही सब कुछ है, तो फिर नियम-कानून किसलिए?

 

बड़ा सवाल

 

क्या सच में कवर्धा का SDM कार्यालय “सेवा केंद्र” से ज्यादा “सेटिंग केंद्र” बन चुका है?

 

क्या बिना पैसे दिए अब आम आदमी का कोई काम नहीं होगा?

 

अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस चर्चा को “अफवाह” बताकर टालते हैं या फिर सच में इस पर कोई कार्रवाई होती है…

 

क्योंकि…

 

चाय की चर्चा कभी-कभी बड़े-बड़े सच उजागर कर देती है

 

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