चाय पर चर्चा

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पत्रकार दीपक तिवारी
चर्चा एक ऐसे शख्स की, जो इन दिनों नगर पालिका के गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक चर्चा का विषय बना हुआ है। नाम है – रवि साहू।

शहर में इन दिनों तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कोई कह रहा है कि नगर पालिका में करोड़ों रुपये के विकास कार्यों का बजट लाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है तो कोई दावा कर रहा है कि लगभग दो करोड़ रुपये के कामों पर उनका सीधा प्रभाव है। चाय की दुकानों पर बैठने वाले लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि “जब बजट लाने में हमारी मेहनत लगी है तो फिर कमीशन किस बात का

हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन चर्चाओं का बाजार गर्म है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि कोई व्यक्ति विकास कार्यों के बजट को स्वीकृत कराने में प्रभावी भूमिका निभाता है और बाद में उन्हीं कार्यों को कराने में भी उसकी भूमिका दिखाई देती है, तो पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल स्वाभाविक रूप से खड़े होते हैं।
शहर में यह भी चर्चा है कि रवि साहू की पहुंच सत्ता के शीर्ष स्तर तक है। कुछ लोग दावा करते हैं कि उनकी सीधी पकड़ नगरीय प्रशासन से जुड़े बड़े नेताओं तक है। यही कारण है कि नगर पालिका के अंदर होने वाले कई फैसलों में उनका नाम चर्चा का विषय बन जाता है। यहां तक कि नए अधिकारियों की नियुक्ति और पदस्थापना को लेकर भी लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं।

चाय पर बैठे बुजुर्ग कहते हैं कि लोकतंत्र में विकास कार्य होना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो। जनता को यह जानने का अधिकार है कि बजट कैसे आया किस आधार पर काम स्वीकृत हुए, किस एजेंसी को काम मिला और गुणवत्ता की निगरानी कौन कर रहा है।

आज की चर्चा का सार यही है कि जब किसी व्यक्ति का नाम लगातार विकास कार्यों, बजट, ठेकों और प्रशासनिक फैसलों के साथ जोड़ा जाने लगे तो जिज्ञासा बढ़ना स्वाभाविक है। सच क्या है और अफवाह क्या है इसका जवाब संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारी ही दे सकते हैं। लेकिन फिलहाल शहर की चाय दुकानों में एक ही सवाल गूंज रहा है

आखिर कौन है रवि साहू जिसकी चर्चा बजट से लेकर ठेकों और अधिकारियों की नियुक्तियो

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