जब आपके भीतर की दुष्टता पृथक हो जाएगी तब उत्तम मार्दव धर्म सामने आएगा आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज

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रायपुर। सन्मति नगर फाफाडीह में पर्युषण पर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म की साधना की गई। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि मृदुता का भाव ही मार्दव धर्म है। व्यक्ति के अंदर मान कषाय के कारण आत्म स्वभाव में विद्यमान मृदुता,कोमलता और विनम्रता नष्ट हो जाती है। इससे व्यक्ति की वाणी,व्यवहार और बुद्धि में अहंकार आ जाता है। व्यक्ति अपने आपको ही बड़ा समझने लगता है। जैसे गर्म पानी में उठते बुलबुलो में चेहरा नजर नहीं आता है, पानी ठंडा होने पर ही चेहरा दिखाई देता है। ऐसे ही शांत मन से सोचने पर ही समझ आएगा कि आपके चित्त में मान कहां-कहां टकरा रहा है और मार्दव धर्म कहां कहां आ रहा है। मान रहित होना मार्दव धर्म है। जब आपके भीतर की दुष्टता पृथक हो जाएगी तब उत्तम मार्दव धर्म सामने आएगा।
आचार्यश्री ने कहा कि जो विनयशील होगा वह विनय योग्य की विनय तो करेगा ही,साथ ही जो विनय करने वाले हैं उनकी भी विनय करेगा। अज्ञानी लोग अविनय की भाषा बोलते हैं,ज्ञानी लोग विवेक पूर्वक विनय की भाषा बोलते हैं। जीवन में किसी को भगाना मत सीखो बुलाना सीखो। यदि बुलाना सीख लोगे तो सामने वाला अपने आप भाग जाएगा। ऐसे ही मोक्ष मार्ग में चारित्र को भगाना मत सीखो, बुलाना सीखो। जब चारित्र विराजमान हो जाएगा तो असंयम भाग जाएगा और जब असंयम भाग जाएगा तो कर्म भागना प्रारंभ हो जाएगा।

आचार्यश्री ने कहा कि अपने क्रोध को ठंडा करो। जो क्रोधी है उसे कुछ भी नहीं दिखता, जैसे बाहर से अंदर प्रवेश करने पर कुछ नहीं दिखता। बाहर प्रकाश से आने पर आपको कमरे के अंदर अंधेरा दिखता है, ऐसे ही कषाय की ज्योति भड़कने पर सत्य और तत्व कुछ भी समझ में नहीं आता। अहंकार का स्वाद आने से कितनों को तो आज तक धर्म का स्वाद नहीं आया है। आत्मा की शुद्धि का आनंद आना चाहिए। जहां मान कषाय का आनंद आता है वहां व्यक्ति यही सोचता है मेरे खड़े होने के बगैर यहां कुछ नहीं हो सकता।
आचार्यश्री ने कहा कि अपने अहंकार का त्याग करो। जैसे दीया बुझने के पहले उसकी लौ बहुत बड़ी हो जाती है, ऐसे ही व्यक्ति के विनाश के दिन आते हैं तो अहंकार बढ़ने लगता है। यदि अपना विनाश नहीं चाहते तो अपने मान को घटाइए। ज्ञान विनय, दर्शन विनय, चारित्र विनय, उपचार विनय और तप विनय करना सीखो। कितनी विद्या हासिल कर लो बिना विनय के सारी विद्या निष्फल है। जीवन में किसी भी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए,अहंकार ही व्यक्ति के पतन का कारण होता है।
जो विषयों का दास है उससे बड़ा कोई गरीब नहीं है : मुनिश्री संजयंत सागर जी
मुनिश्री संजयंत सागर जी ने कहा कि विषय दासता सबसे बड़ी गरीबी है। जगत में इससे बड़ी कोई दरिद्रता नहीं है। इंद्रिय विषय की आसक्ति छोड़नी पड़ेगी। यदि लोभ को जीतना चाहते हो तो संतोष से जीतो,यदि भूख को जीतना चाहते हो तो उपवास से जीतो और काम को यदि जीतना चाहते हो तो विरक्ति से जीतो। विरक्त हो जाओ तो काम कुछ नहीं कर पाएगा। आसक्ति का आनंद तो आपने वर्ष भर लिया है, पर्यूषण पर्व के 10 दिन में विरक्ति का आनंद लो। जो विषयों का दास है उससे बड़ा कोई गरीब नहीं है। जब तक विरक्ति नहीं आएगी तब तक सच्चा आनंद आने वाला नहीं है। आसक्ति में जितना आनंद है वह कभी न कभी भंग हो ही जाता है। जब विरक्त हो जाओगे और विरक्ति का आनंद लोगे तो सिद्धों के सागर में मिल जाओगे। फिर वह आनंद मिलेगा जो कभी समाप्त नहीं होगा। जिसको हमेशा सुखी होना है तो वे मोक्ष मार्ग का अनुसरण करें।

विशुद्ध देशना मंडप में श्रीजी का अभिषेक और शांति धारा का मिला सौभाग्य
विशुद्ध वर्षा योग समिति के कार्यकारी अध्यक्ष मनीष बाकलीवाल व मनोज पांड्या ने बताया कि पर्युषण पर्व का दूसरा दिन उत्तम मार्दव धर्म की साधना की गई। श्रीजी का अभिषेक करने का सौभाग्य पदमचंद जी,अभिनव,अपूर्व सोनी मुंबई, डॉक्टर निर्मल जैन रतलाम, हरिश्चन्द्र जी मनोरमा जी जैन मुंबई को प्राप्त हुआ। शांतिधारा का सौभाग्य पुण्यार्जक डॉक्टर निर्मल जैन रतलाम, विमला देवी पारसमलजी, अनिल कुमार बाकलीवाल रायपुर, मानमलजी विनीत कुमार बड़जात्या रायपुर को प्राप्त हुआ। आचार्यश्री के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य पदमचंदजी अभिनव,अपूर्व सोनी मुंबई और शास्त्र भेंट का सौभाग्य पवन कुमार जी जय कुमार जी अहमदाबाद को प्राप्त हुआ।

आचार्यश्री को अर्घ्य समर्पित कर गुरु भक्तों ने लिया आशीर्वाद
विशुद्ध देशन मंडप में आज मंगलाचरण ब्रह्मचारी विपुल भैय्या भिंड ने किया। दीप प्रज्वलन – चिरगांव ,ललितपुर, झांसी , उत्तरप्रदेश से आए शिविरार्थी भक्तगण,सिवनी, टीकमगढ़, बड़नगर, उज्जैन, विदिशा, सिलवानी,सभी मध्यप्रदेश व साथ ही राजस्थान से आए शिविरार्थी भक्तगण ने किया। श्रीजी का अभिषेक व शांतिधारा करने वालों ने आचार्यश्री को श्रीफल समर्पित कर आशीर्वाद लिया। जिनवाणी स्तुति व अर्घ्य पठन संगीता जैन ने किया। कार्यक्रम का संचालन अरविंद जैन और दिनेश काला ने किया। कार्यक्रम के अंत में धर्मसभा में उपस्थित सभी गुरु भक्तों ने आचार्यश्री को अर्घ्य समर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

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