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मदर्स डे : 5 साल की अनाथ ने शारदा को बनाया 80 बेटियों की मां

मां कैसे आपको संवारती है? जीवन के लिए तैयार करती है ? मां की सबसे बड़ी आस होती है अपने बच्चे की खुशी। शायद इसीलिए हमारी खुशी की तलाश भी मां के पास पहुंचकर पूरी होती है। आपकी खुशी किसमें है यह बात कहे बिना मां सुन लेती है। तो आज मदर्स डे पर पढ़िए 4 कहानियों को और समझिए कि कैसे एक मां चाहे तो घर से लेकर समाज तक को बदल सकती है…

1. 5 साल की अनाथ बच्ची ने शारदा को बनाया 80 बेटियों की ‘मॉम’

मुंबई के धारावी में शरणम नाम से शेल्टर होम में इस वक्त करीब 25 अनाथ बच्चियां रहती हैं। इन बच्चियों को शिक्षा देने और आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा इनकी ‘मॉम’ शारदा निर्मल ने उठा रखा है। शारदा ने अब तक 80 अनाथ बच्चियों की परवरिश की है। निर्मल कम्युनिटी आउटरीच प्रोग्राम की प्रोजेक्ट मैनेजर शारदा बताती हैं कि पढ़ाई के दिनों में मैं अपने क्षेत्र में अकेली लड़की थी, जो 10वीं क्लास की पढ़ाई कर रही थी। लड़कियों के प्रति समाज की सोच यह थी कि ये पढ़कर क्या करेंगी।

इसलिए जब मैं कामयाब हुई तो शरणम शुरू किया, तब मेरा मकसद लड़कियों की शिक्षा ही था। कुछ साल पहले शेल्टर होम में एक पांच साल की बच्ची आई। बाकी बच्चे तब मुझे दीदी बुलाते थे, लेकिन वह मुझे मां कहने लगी। उस वक्त मैं एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसलिए मुझे अहसास होने लगा था कि मां होना कितना अहम है। मैंने अपने बच्चों को समझाया कि शेल्टर होम में रहने वाली बच्चियां अनाथ हैं, इसलिए शायद मैं तुमसे ज्यादा उन्हें गले लगाऊं।

मेरा तीन साल का बेटा तब अपनी टीचर को बताता था कि उसकी 30 बहनें हैं। अब शेल्टर होम की सारी बच्चियां मुझे मॉम पुकारती हैं। शारदा कहती हैं कि मां जड़ व पिता पेड़ है। पिता की मेहनत फल के रूप में दिखाई देती है, लेकिन पेड़ मजबूती से खड़ा रहे यह ताकत मां ही देती है।

2. कार रेसिंग में एकमात्र मां-बेटी की टीम

कर्नाटक के दावणगेरे की शिवानी पृथ्वी (24) और उनकी मां दीप्ति पृथ्वी (52) मां-बेटी की अनूठी जोड़ी है, जो एक-दूसरे के नक्शे कदम पर चल रही हैं। मां बेटी के लिए कार रेसिंग में मददगार बनी है, तो बेटी ने मां की तरह मेडिकल फील्ड को अपनाया है। खास बात यह है कि जोड़ी इंडियन नेशनल रैली चैम्पियनशिप (INRC) में एक टीम के रूप में साथ ट्रैक पर उतर चुकी है। बात 2016 की है, तब शिवानी धारवाड़ के एसडीएम मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही थी।

पढ़ाई का दबाव रहता था, इसलिए छुट्टी में घर आई तो पिता मन बहलाव के लिए अपने पाइप कारखाने के यार्ड में ले गए, जहां शिवानी ने पिता की रेसिंग कार चलाई। पिता ने कहा, तुम तो रेसिंग में इंटरनेशनल पुरस्कार जीत सकती हो। इससे शिवानी में ललक पैदा हुई और ट्रेनिंग शुरू किया। 2018 में पेशेवर रेसिंग ड्राइवर के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया, लेकिन 2019 में INRC के लिए उन्हें नेविगेटर (को-ड्राइवर) मिलने में परेशानी हो रही थी।

वो नई थी, इसलिए कोई भी चांस नहीं लेना चाहता था। ऐसे में मां डॉ. दीप्ति नेविगेटर बनने के लिए आगे आाईं। उन्होंने पहले कभी यह नहीं किया था, पर बेटी के लिए आगे आईं और इस तरह मां-बेटी की टीम तैयार हुई और वे महिला वर्ग में टॉप पर रहीं।

3. मदर्स कमेटी ने प्राथमिक स्कूल को सुधारा, अब यहां हर बच्चा ‘पढ़ाकू’

असम के गुतंग गांव की कुछ महिलाओं ने सड़क पर खेलते कुछ बच्चों से पूछा कि स्कूल क्यों नहीं गए? बच्चों का जवाब था- स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता। इस जवाब ने उन महिलाओं को झकझोरा और जन्म हुआ ‘मदर्स कमेटी’ का। कमेटी का काम था, हर बच्चे को रोज स्कूल भेजना। कमेटी की सदस्य दीपा बताती हैं कि हमने रोज स्कूल का रजिस्टर चेक करना शुरू किया कि कौन बच्चा स्कूल नहीं आया।

कमेटी ने शिक्षकों के लिए स्कूल आने जरूरी कर दिया। अगर वो नहीं आ रहे हैं तो इसकी सूचना कमेटी को भी मिले। कमेटी के सदस्य पढ़ाई में बच्चों की मदद करने लगे और मिड डे मिल के लिए खाना बनाने की निगरानी भी अपने हाथ में ले ली। दीपा गर्व से कहती हैं कि इस पहल के बाद बीते 12 सालों में गांव की मांओं ने हर बच्चे के लिए मेहनत की है। इसके नतीजे भी सामने आए हैं।

दर्जनों बच्चों ने 10वीं की परीक्षा अच्छे नंबर के साथ पास की है। कइयों ने टॉप किया। अब तो लगता है यहां का हर बच्चा पढ़ाकू बनना चाहता है। कमेटी की सदस्य 36 साल की हुनुति बताती हैं कि कमेटी चाइल्ड क्लब के माध्यम से बच्चों को सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करती है। इसमें गांव के बुजुर्गों को भी बुलाते हैं ताकि वे कहानियां सुनाएं। इससे बच्चों को स्कूल में आनंद आने लगा।

4. मां की आंखों से दुनिया देखने का सुकून सबसे बड़ा

केरल के सरथ रामचंद्रन सरथ अपनी मां के अनुभव की आंखों से दुनिया देख रहे हैं। आमतौर पर युवा जब पर्यटन पर जाते हैं तो दोस्तों और अपने हमउम्रों का साथ ढूंढते हैं, लेकिन 30 साल के बिजनेसमैन सरथ अनूठे हैं। वे जहां भी जाते हैं, अपनी 64 साल की मां गीता को साथ ले जाते हैं। वे कहते हैं कि मैंने महसूस किया था कि मां ने तो शायद ही कभी अपने घर के पास के वडक्कुमनाथ मंदिर से आगे की दुनिया देखी होगी।

इसलिए मैंने उन्हें साथ चलने के लिए कहा। पहले उन्होंने इनकार किया। वो कहती थीं कि मुझे घर पर ही रहना पसंद है। मैंने उन्हें मनाया और पहले वाराणसी ले गया। वहां से हम शिमला गए। फिर मनाली से बाइक से रोहतांग की यात्रा की। वह पहली बार था जब मां ने बाइक से इतनी लंबी यात्रा की थी। अब तो मां गीता काे यात्रा में आनंद आने लगा है और वे लगभग आधा देश साथ घूम चुके हैं। हमारी सबसे लंबी यात्रा 16 दिन की कैलाश मानसरोवर की रही है।

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