चाय पर चर्चा: जनता सवाल पूछे तो जवाब मिलेगा या झिड़की?

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Discussion over tea

पत्रकार दीपक तिवारी

कवर्धा शहर में इन दिनों चाय की दुकानों, चौक-चौराहों और गलियों में एक ही मुद्दे की चर्चा जोरों पर है। मामला वार्ड क्रमांक 5 के एक वार्डवासी और नगर पालिका अध्यक्ष के बीच हुए कथित विवाद का है।

वार्डवासी का आरोप है कि वह पिछले डेढ़ साल से अपनी समस्या को लेकर लगातार नगर पालिका अध्यक्ष के पास गुहार लगा रहा था। उनका कहना है कि 50 से अधिक बार समस्या से अवगत कराने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जब बार-बार प्रयास के बाद भी समाधान नहीं मिला तो उन्होंने फोन पर अध्यक्ष से संपर्क किया। आरोप है कि अध्यक्ष जी ने उन्हें नए बस स्टैंड बुलाया, जहां बातचीत के दौरान गाली-गलौज और धमकी दी गई।

वार्डवासी के अनुसारअध्यक्ष ने कथित तौर पर कहामैं तुम्हारा नौकर नहीं हूं तुम्हारा ठेका लेकर नहीं बैठा हूं। इतना ही नहीं,वार्डवासी का दावा है कि अध्यक्ष जी ने यह भी कहा,मैं मंत्री जी के आशीर्वाद से अध्यक्ष बना हूं, तेरे आशीर्वाद से नहीं बना हूं। इस कथित बयान के बाद लोगों के बीच यह चर्चा और तेज हो गई कि आखिर जनता के वोट और विश्वास का सम्मान किस प्रकार किया जा रहा है।

वार्डवासी का कहना है कि जनप्रतिनिधि का काम जनता की समस्याएं सुनना और उनका समाधान करना होता है, लेकिन यहां समस्या बताने पर ही नाराजगी और अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने पूरे मामले की जानकारी मंत्री जी तक पहुंचाई। स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, मंत्री जी के हस्तक्षेप के बाद उनके कार्यकर्ताओं ने पहल की और वह काम पूरा हुआ, जो डेढ़ साल से लंबित बताया जा रहा था।

अब शहर में लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि मंत्री जी के कहने पर काम हो सकता था, तो फिर वार्डवासी को डेढ़ साल तक चक्कर क्यों लगाने पड़े क्या आम नागरिक की समस्या तब तक महत्वपूर्ण नहीं होती जब तक मामला किसी बड़े नेता तक न पहुंच जाए

चाय की चुस्कियों के बीच यह चर्चा भी सुनाई दे रही है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। कई लोगों का कहना है कि पहले भी जनता के साथ इसी तरह के व्यवहार की शिकायतें सामने आती रही हैं। हालांकि इन सभी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है और संबंधित पक्ष का पक्ष भी सामने आना आवश्यक है।

चाय पर चर्चा का सवाल:

जनता ने जनप्रतिनिधि चुना है ताकि उनकी समस्याओं का समाधान हो सके। लेकिन यदि जनता को ही अपनी बात कहने पर अपमानित महसूस करना पड़े, तो लोकतंत्र की असली ताकत आखिर कहां दिखाई देती है।

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