SC DISMISSES : Supreme Court dismisses the petition of Justice Yashwant Verma
नई दिल्ली, 8 अगस्त 2025. सुप्रीम कोर्ट ने आज इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ की गई इन-हाउस जांच रिपोर्ट और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को भेजी गई सिफारिश को चुनौती दी थी। याचिका में उनके पद से हटाने की प्रक्रिया को असंवैधानिक बताया गया था।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने यह निर्णय सुनाते हुए कहा कि जस्टिस वर्मा ने खुद इन-हाउस जांच प्रक्रिया में भाग लिया था, और बाद में उसकी वैधता पर सवाल उठाया। इस कारण उनकी याचिका स्वीकार्य नहीं है। हालांकि पीठ ने संविधान से जुड़े अन्य पांच प्रमुख बिंदुओं पर भी निर्णय दिया।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के प्रमुख बिंदु –
इन-हाउस जांच को कानूनी मान्यता है।
यह कोई समानांतर या असंवैधानिक प्रक्रिया नहीं है।
यह प्रक्रिया हाईकोर्ट जज के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं करती।
सीजेआई और जांच समिति ने प्रक्रिया का संपूर्ण पालन किया – केवल वीडियो और फोटो अपलोड नहीं किए गए, जो कि अनिवार्य नहीं था।
सीजेआई द्वारा रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजना पूर्णतः वैधानिक है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रिपोर्ट भेजने से पूर्व न्यायमूर्ति वर्मा को व्यक्तिगत रूप से सुनवाई का अवसर देना आवश्यक नहीं था। भविष्य में यदि संसद में महाभियोग की प्रक्रिया आरंभ होती है, तो उन्हें वहां अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा।
इसके साथ ही, एडवोकेट मैथ्यूज जे. नेडुमपारा द्वारा दायर वह याचिका भी खारिज कर दी गई जिसमें जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई थी।
मामला क्या है?
मार्च 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में कार्यरत जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के आउटहाउस में आग लगने के बाद फायर ब्रिगेड की टीम ने बड़ी मात्रा में नकदी बरामद की थी। यह मामला सार्वजनिक रूप से चर्चा में आ गया।
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने तीन सदस्यीय इन-हाउस जांच समिति गठित की जिसमें शामिल थे:
जस्टिस शील नागु (तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, पंजाब-हरियाणा)
जस्टिस जीएस संधावालिया (तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, हिमाचल प्रदेश)
जस्टिस अनु शिवरामन (कर्नाटक हाईकोर्ट)
जांच में 55 गवाहों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर पाया गया कि नकदी जस्टिस वर्मा के नियंत्रण वाले क्षेत्र में मिली थी। वर्मा इस पर कोई स्पष्ट और विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं दे सके, केवल सामान्यतः “षड्यंत्र” का दावा किया गया।
आगे क्या?
सूत्रों के अनुसार, लोकसभा और राज्यसभा के कई सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। यदि यह प्रस्ताव स्वीकार होता है, तो संसद में उनके खिलाफ महाभियोग चल सकता है।

