रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज आयोजित कलेक्टर-डीएफओ कॉन्फ्रेंस में प्रदेश के वन, पर्यावरण और ग्रामीण आजीविका से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की। बैठक में औषधीय पौधों की खेती, बांस आधारित उद्योगों के विस्तार और इकोटूरिज्म के माध्यम से ग्रामीणों की आय बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने के लिए ठोस योजना तैयार की जाए। धमतरी, मुंगेली और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (जीपीएम) जिलों में औषधीय पौधों की खेती पर कार्य कर रहे डीएफओ ने अपनी जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि इस पहल से न केवल लोगों की आजीविका में वृद्धि होगी, बल्कि परंपरागत औषधीय ज्ञान को भी बढ़ावा मिलेगा।
औषधीय पादप बोर्ड के सीईओ ने बैठक में बताया कि राज्य में औषधीय पौधों की खेती के क्षेत्र में बड़ी संभावनाएं हैं। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि इस दिशा में प्रचार-प्रसार गतिविधियां तेज की जाएं और कृषि व उद्यानिकी विभाग के मैदानी अमले की सहायता से किसानों को प्रोत्साहित किया जाए।
बैठक में बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर जिलों में पिछले सीजन के तेंदूपत्ता संग्रहण की समीक्षा की गई और आने वाले सीजन के लिए कार्य योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए।
मुख्यमंत्री साय ने जानकारी दी कि “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के तहत दो वर्षों में 6 करोड़ से अधिक पौधों का रोपण किया गया है, वहीं माइक्रो अर्बन फॉरेस्ट वृक्षारोपण की भी शुरुआत की गई है। उन्होंने कहा कि इकोटूरिज्म में ग्रामीणों की आजीविका के बड़े साधन छिपे हुए हैं, और राज्य के 240 नैसर्गिक पर्यटन केंद्रों से बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार प्राप्त हो रहा है। इनसे अप्रत्यक्ष रूप से लगभग दो हजार परिवारों को भी लाभ हो रहा है।
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि राज्य में 3.71 लाख हेक्टेयर बांस वन क्षेत्र है, जो आजीविका का प्रमुख स्रोत बन सकता है। उन्होंने निर्देश दिए कि बाजार में अधिक कीमत प्राप्त करने वाली बांस की प्रजातियों को बढ़ावा दिया जाए और विशेष पिछड़ी जनजातियों को बांस आधारित उद्योगों से जोड़ा जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि राज्य के 28 बांस प्रसंस्करण केंद्रों को सक्रिय किया जाए, बांस शिल्पकारों को बाजार से जोड़ा जाए और जनजातीय परिवारों को बाजार की मांग के अनुरूप प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।
मुख्यमंत्री ने सभी जिलों के कलेक्टर और डीएफओ को निर्देशित किया कि वन संपदा के संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए।
