Chai Pe Charcha: Development or commission game in the municipal corporation? Councillors’ displeasure becomes the talk of the town.
पत्रकार दीपक तिवारी
कबीरधाम। इन दिनों शहर की चाय की दुकानों, चौक-चौराहों और राजनीतिक गलियारों में एक ही चर्चा सुनाई दे रही है कि नगर पालिका क्षेत्र में चल रहे करोड़ों रुपये के विकास कार्यों को लेकर कुछ पार्षदों में गहरी नाराजगी है।
चर्चा है कि कुछ पार्षदों का कहना है कि उनकी बातों को महत्व नहीं दिया जा रहा। उनका आरोप है कि विकास कार्यों के संबंध में न तो उनकी राय ली जाती है और न ही उनके सुझावों पर ध्यान दिया जाता है। उनका कहना है कि वार्डों में कौन-सा काम होगा और कैसे होगा, इसका निर्णय उनकी जानकारी के बिना ही किया जा रहा है।
चाय की टपरी पर यह भी चर्चा है कि कुछ पार्षदों के अनुसार विकास कार्यों की गुणवत्ता और लागत को लेकर सवाल उठ रहे हैं। चर्चा यह भी है कि कई कार्यों में अनुमानित लागत बढ़ाए जाने की बातें कही जा रही हैं और इस पर पारदर्शिता की मांग की जा रही है।
शहर में यह भी चर्चा है कि कुछ पार्षदों ने अधिकारियों की कार्यशैली पर असंतोष जताते हुए कहा कि उनकी शिकायतों और सुझावों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा। लोगों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि जनप्रतिनिधियों की बात नहीं सुनी जाएगी तो आम जनता की समस्याओं का समाधान कैसे होगा? विश्वास सूत्र बताते हैं कि चेक काटने से पहले कमीशन सीईओ और इंजीनियर को मिल जाता है।
अब शहर में चर्चा का सबसे बड़ा विषय यही है कि क्या नगर पालिका में चल रहे विकास कार्य पूरी पारदर्शिता और गुणवत्ता के साथ हो रहे हैं, या फिर इन आरोपों की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है। यदि लगाए जा रहे आरोपों में सच्चाई है तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, और यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें स्पष्ट तथ्यों के साथ सार्वजनिक रूप से खारिज किया जाना चाहिए।
