चाय बेचने वाला बना IPS से IAS, पिता करता था दिहाड़ी मजदूरी

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अगर मन में कुछ कर गुजरने की लगन हो तो आप किसी भी मुकाम तक पहुंच सकते हैं. अक्सर लोग कहते हैं कि जिसके पास कोचिंग में खर्च करने के लिए अच्छे-खासे पैसे हैं वही, आईएएस बन पाते हैं. गरीबी से जूझ रहे या कम पैसों में चल रहे घर के बेटे के लिए यह करना मुश्किल है. असल में ऐसा नहीं है और यह साबित किया है मजदूर के बेटे हिमांशु गुप्ता ने, जो खुद एक चायवाले थे लेकिन आज एक आईएएस ऑफिसर है. हिमांशु गुप्ता की कहानी हर उस उम्मीदवार को प्रेरित करती है जो परेशानियों और कठनाइयों के बीच पढ़ाई छोड़ने का सोचते हैं.हिमांशु गुप्ता ने बचपन बेहद गरीबी में काटा, स्कूल जाने के लिए रोजाना 70 किमी का सफर किया. इतना ही नहीं पिता का हाथ बंटाने के लिए चाय की दुकान पर काम भी किया. उत्तराखंड के हिमांशु गुप्ता (UPSC Himanshu Gupta) ने अपनी कड़ी मेहनत से यूपीएससी की परीक्षा (UPSC Civil Service Exam) पास की और आईएएस अफसर बने. ऑफिशियल ह्यूमन ऑफ बॉम्बे पर छपी ये स्टोरी हर कैंडिडेट को प्रोतसाहित करती है. UPSC क्लियर कर आईपीएस बनने वाले हिमांशु गुप्ता के पैरेंट्स स्कूल ड्रॉपआउट हैं. पिता दिहाड़ी मजदूरी करते थे. कमाने के लिए वो चाय का ठेला भी लगाते थे लेकिन उन्होंने कभी भी अपने बेटे की पढ़ाई के कॉम्प्रोमाइज नहीं किया.हिमांशु गुप्ता ने साल 2018 में पहली बार UPSC Exam क्लियर किया, तब उनका चयन भारतीय रेलवे यातायात सेवा (IRTS) के लिए हुआ. उन्होंने 2019 में फिर से परीक्षा दी और दूसरे प्रयास में भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के लिए चयन हुआ. और फिर 2020 में अपने तीसरे प्रयास में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में सेलेक्ट हो गए. ‘Humans of Bombay’ फ़ेसबुक पेज पर हिमांशु गुप्ता अपनी कहानी बताते हुए कहते हैं- ‘मैं स्कूल जाने से पहले और बाद में पिता के साथ काम करता था. स्कूल 35 किमी दूर था, आना-जाना 70 किमी होता था. मैं अपने सहपाठियों के साथ एक वैन में जाता था. जब भी मेरे सहपाठी हमारे चाय के ठेले के पास से गुजरते, मैं छिप जाता. लेकिन एक बार किसी ने मुझे देख लिया और मजाक उड़ाना शुरू कर दिया. मुझे ‘चायवाला’ कहा जाने लगा. लेकिन उस ओर ध्यान देने के बजाय पढ़ाई पर ध्यान लगाया और जब भी समय मिला पापा की मदद की. हम सब मिलकर अपना घर चलाने के लिए रोजाना 400 रुपये कमा लेते थे.’हिमांशु गुप्ता आगे कहते हैं- ‘लेकिन मेरे सपने बड़े थे. मैं एक शहर में रहने और अपने और अपने परिवार के लिए एक बेहतर जीवन बनाने का सपना देखता था. पापा अक्सर कहते थे, ‘सपने सच करने है तो पढाई करो!’ तो मैंने यही किया. मुझे पता था कि अगर मैं कड़ी मेहनत से पढ़ूंगा, तो मुझे एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में प्रवेश मिल जाएगा. लेकिन मुझे अंग्रेजी नहीं आती थी, इसलिए मैं अंग्रेजी मूवी डीवीडी खरीदता था और उन्हें सीखने के लिए देखता था.’

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