If society extends its support, the fortunes of journalism can still be revived: Sharma
रायपुर। विज्ञापन आधारित पत्रकारिता के लिए कहीं न कहीं हमारा समाज जिम्मेदार है। हम दो सौ रुपये का आइसक्रीम का फैमिली पैक लेने तो तैयार हैं, लेकिन 10 रुपये का समाचार पत्र लेने तैयार नहीं। अगर हमें दो-तीन रुपये का अखबार लेना है, तो वह वैसा ही मिलेगा, जैसा आज हम ले रहे हैं, विज्ञापन और बिजनेस मैनेजमेंट के दबाव व प्रभाव वाला। इस आशय के विचार महाराष्ट्र मंडल के शिवाजी महाराज सभागृह में आयोजित पं. माधव राव सप्रे जयंती पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि शशांक शर्मा ने व्यक्त किए।
सप्रे जयंती पर आयोजित इस समारोह में मराठी भाषी हिंदी साहित्यकारों लतिका भावे रायपुर, प्रशांत कानस्कर भिलाई, अनिल पुसदकर रायपुर और वरदा जोशी भिलाई को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। महाराष्ट्र मंडल, छत्तीसगढ़ मित्र और छत्तीसगढ़ साहित्य व संस्कृति संस्थान रायपुर के संयुक्त आयोजन में मुख्य अतिथि शशांक शर्मा, विशेष अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज, कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे साहित्यकार डॉ. परदेशीराम वर्मा का भी अभिनंदन किया गया।
मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने कहा कि महज तीन सालों के बाद ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन करने वाले पं. माधव राव सप्रे को अंतिम अंक में यह लिखना पड़ा था कि ‘भारत में आज भी हिंदी को लेकर जागरूकता नहीं है। लोगों में हिंदी का महत्व भी नहीं है। साथ ही छत्तीसगढ़ मित्र को लेकर पाठकों का सहयोग भी नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि हमें छत्तीसगढ़ मित्र को बंद करना पड़ रहा है। हालांकि उन्होंने ये भी लिखा कि पत्रिका का मुद्रण अच्छी तरह नहीं हो पा रहा है, सही समय पर नहीं हो पा रहा है। इन्हीं कारणों से भी हमें ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ को बंद करना पड़ रहा है।
शशांक शर्मा कहते हैं कि उस काल में एक से एक पत्रकार थे, लेकिन सभी ब्राह्मण थे, जिन्हें अच्छी साफ- सुथरी पत्रकारिता तो आती थी, लेकिन प्रबंधन के मामले में वे कच्चे थे। इसके उलट मोहन दास करमचंद गांधी जितने अच्छे पत्रकार थे, उतना ही अच्छा प्रबंधन कौशल था। यही वजह है कि उनकी हिंदी पत्रिका ‘नव जीवन’ और अंग्रेजी पत्रिका ‘यंग इंडिया’ का प्रकाशन सफलतापूर्वक दशकों तक होता रहा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. परदेशी राम वर्मा ने पं. सप्रे जयंती पर मूर्धन्य साहित्यकार कमलेश्वर की ओर से पहली बार प्रमाणित हिंदी साहित्य की पहली कहानी पं. माधव राव सप्रे द्वारा लिखित ‘एक टोकरी मिट्टी’ को बिना देखे- पढ़े भावनात्मक रूप से सुनाया। साथ ही कहानी के मायने भी बताए। डॉ. वर्मा ने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में पं. सप्रे ने ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन किया। उसी तरह आज भी ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन इतना आसान नहीं है, फिर भी डॉ. सुधीर शर्मा इस ओर लगातार काम कर रहे हैं। यह प्रशंसनीय है और वे साधुवाद के पात्र हैं। इस मौके पर विशिष्टि अतिथि गिरीश पंकज और डॉ. सुशील त्रिवेदी ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन साहित्यकार डॉ. सुधीर शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन रविंद्र ठेंगड़ी की ओर से किया गया।
