चाय पर चर्चा

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Discussion over Tea

पत्रकार दीपक तिवारी

कवर्धा शहर में इन दिनों चाय की चुस्कियों के साथ एक ही नाम बार-बार गूंज रहा है—कलेक्टर ऑफिस का वह चर्चित बाबू, जिसकी कार्यशैली अब पूरे कबीरधाम जिले में चर्चा और नाराज़गी का विषय बन चुकी है। आम जनता की मानें तो यह बाबू अपने आपको किसी अधिकारी से कम नहीं समझता, बल्कि कई बार तो कलेक्टर से भी ऊपर का व्यवहार करता नजर आता है।

बताया जाता है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी समस्या लेकर इस बाबू के पास पहुंचता है, तो उसे समाधान तो दूर, सही जानकारी तक नहीं मिलती। सीधे-सीधे जवाब मिलता है—“जाइए, कलेक्टर से बात करिए, मैं कुछ नहीं बताऊंगा।” सवाल यह उठता है कि जब हर काम के लिए कलेक्टर के पास ही जाना है, तो फिर ऐसे बाबू की कुर्सी का आखिर मतलब क्या है?

लोगों का आरोप है कि न सिर्फ जानकारी देने में टालमटोल की जाती है, बल्कि बात करने का तरीका भी बेहद अपमानजनक होता है। आमजन के साथ बदतमीजी, फाइलों को लटकाना और काम को अनावश्यक रूप से टालना अब इस बाबू की पहचान बन चुकी है। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि लोग सरकारी दफ्तर जाने से पहले ही मानसिक रूप से परेशान हो जाते हैं।

सूत्रों की मानें तो इस बाबू की पहुंच सीधे “ऊपर” तक है, जिससे उसके खिलाफ शिकायत करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पाता। डर का माहौल ऐसा कि लोग अपनी समस्या दबा लेते हैं, लेकिन आवाज नहीं उठाते। अंदरखाने यह भी चर्चा है कि कई बार अन्य कर्मचारी भी उसके व्यवहार से परेशान रहते हैं, लेकिन मजबूरी में चुप्पी साधे रहते हैं।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या कलेक्टर कार्यालय आम जनता की सेवा के लिए है या फिर कुछ चुनिंदा लोगों के अहंकार का अड्डा बनता जा रहा है? अगर हालात ऐसे ही रहे, तो जनता का भरोसा प्रशासन से उठना तय है।

चाय की टेबल पर उठ रहा सवाल:

क्या इस बाबू पर कभी कार्रवाई होगी, या फिर ‘ऊंचे संबंध’ के दम पर यूं ही चलता रहेगा ‘बाबू राज’?

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