CG BREAKING : पद्म विभूषण तीजन बाई नहीं रहीं, पंडवानी की बुलंद आवाज हमेशा के लिए हुई खामोश

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CG BREAKING: Padma Vibhushan Teejan Bai is no more, the powerful voice of Pandavani has been silenced forever.

दुर्ग। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर पहचान दिलाने वाली पंडवानी की महान गायिका तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर एम्स में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और उनका इलाज चल रहा था। सुबह करीब 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पूरे प्रदेश सहित देशभर के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

देर रात मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने उनके परिजनों से फोन पर बात कर स्वास्थ्य की जानकारी ली थी। वहीं, उनकी बहू रेणु ने बताया कि माता जी का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव गनियारी में पूरे रीति-रिवाज के साथ किया जाएगा।

तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज, अभिनय और अनूठी प्रस्तुति शैली के जरिए पंडवानी को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाई। महाभारत की कथाओं को जीवंत करने की उनकी कला ने लाखों लोगों को मंत्रमुग्ध किया। उन्होंने हजारों मंचों पर प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा का परचम विदेशों तक लहराया।

लोककला के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, फुकोका पुरस्कार समेत कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाधि भी प्रदान की थी।

वर्ष 1980 में सांस्कृतिक राजदूत के रूप में उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, तुर्की, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मॉरीशस की यात्राएं कर पंडवानी को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। दुशासन वध के प्रसंग पर उनकी प्रस्तुति आज भी दुनिया भर में सराही जाती है।

8 अगस्त 1956 को दुर्ग जिले के पाटन विकासखंड के अटारी गांव में जन्मी तीजन बाई का बचपन अभावों में बीता। महज नौ साल की उम्र में उन्होंने अपने चचेरे नाना बृजलाल पारधी से पंडवानी की शिक्षा शुरू की। सामाजिक विरोध, पारिवारिक संघर्ष और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को नहीं छोड़ा और 13 वर्ष की आयु में पहला सार्वजनिक मंचन किया।

संघर्ष, समर्पण और अद्भुत प्रतिभा के बल पर तीजन बाई ने पंडवानी को विश्व स्तर पर स्थापित किया और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनका जाना लोककला जगत के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।

 

 

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