discussion over tea
पत्रकार दीपक तिवारी
कवर्धा। कवर्धा की चाय दुकानों से लेकर चौक-चौराहों तक इन दिनों सहकारिता विभाग को लेकर जमकर चर्चाएं हो रही हैं। लोगों का कहना है कि सहकारिता विभाग में वर्षों से जमे कुछ ऑडिट अधिकारी पूरे सिस्टम पर पकड़ बनाकर बैठे हुए हैं। चर्चा यह भी है कि एक ही जिले में 10-15 वर्षों से टिके रहकर समितियों और सरकारी बैंकों के ऑडिट का काम संभालना कई सवाल खड़े करता है।
चाय पर चर्चा में लोग कहते नजर आते हैं कि जिन समितियों में हर साल लाखों रुपये की गड़बड़ी और धान खरीदी में कमी सामने आती है, वहां आखिर ऑडिट करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती? अगर हर साल अनियमितताएं सामने आती हैं, तो सवाल यह उठता है कि ऑडिट रिपोर्ट में सब कुछ “सही” कैसे दिख जाता है?
लोगों का आरोप है कि सहकारी समितियों में होने वाले भ्रष्टाचार की जड़ कहीं न कहीं ऑडिट सिस्टम की कमजोरी और मिलीभगत भी हो सकती है। जिले में चर्चा यह भी है कि कुछ अधिकारी इतने प्रभावशाली हो चुके हैं कि उनका तबादला होने के बाद भी वे फिर से कबीरधाम वापस लौट आते हैं। इससे आम जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि जिले में मलाईदार विभागों पर कुछ चुनिंदा लोगों का कब्जा बना हुआ है।
चर्चाओं में यह बात भी तैर रही है कि एक ऑडिट अधिकारी ने नौकरी के दौरान करोड़ों की संपत्ति खड़ी कर ली। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर सरकारी वेतन में इतनी बड़ी संपत्ति कैसे खड़ी हो रही है? हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जनता के बीच इसे लेकर गहरी नाराजगी दिखाई दे रही है।
चाय पर चर्चा में लोग कहते हैं कि यदि सहकारिता विभाग और समितियों की निष्पक्ष जांच हो जाए, तो कई बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं। जनता की मांग है कि वर्षों से एक ही जगह जमे अधिकारियों का स्थानांतरण हो और उनकी संपत्तियों की भी जांच कराई जाए, ताकि सहकारिता विभाग पर उठ रहे सवालों का जवाब मिल सके।
नोट : यह सामग्री क्षेत्र में चल रही चर्चाओं और आम लोगों की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। आरोपों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित जांच के बाद ही मानी जाएगी।

