SUPREME COURT : Did the Supreme Court forget its own deadline? The decision came after two years.
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महीने पहले देशभर के हाईकोर्ट्स के लिए साफ कहा था कि फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे 3 महीने से ज्यादा समय तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट का ही एक मामला चर्चा में है, जिसमें फैसला सुनाने में दो साल से ज्यादा का समय लग गया।
CHHATTISGARH : हाईकोर्ट में आज से नया रोस्टर!
मामला दवा कंपनी सैनोफी इंडिया लिमिटेड से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने सोमवार को 99 पन्नों का फैसला सुनाया और कंपनी के खिलाफ सीबीआई की भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी से जुड़ी जांच रद्द करने से इनकार कर दिया।
2024 में फैसला सुरक्षित, अब आया फैसला
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी करने के बाद 15 मई 2024 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसके बाद फैसला सोमवार को सुनाया गया।
यानी जिस अदालत ने हाल ही में फैसलों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने पर सवाल उठाए थे, उसी के एक फैसले में लंबी देरी ने अब न्यायिक व्यवस्था की समयसीमा पर बहस छेड़ दी है।
BARC में दवा खरीद से जुड़ा है मामला
यह मामला मैसूरु स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र यानी BARC के लिए दवाओं की खरीद में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है।
सीबीआई की जांच के अनुसार इस सौदे से सरकार को करीब 3.53 लाख रुपये का नुकसान हुआ था। मामला कई वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित था, जिसके कारण बेंगलुरु की सीबीआई अदालत में चल रही कार्रवाई भी प्रभावित हुई।
कंपनियों पर भी चल सकता है आपराधिक मुकदमा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 99 पन्नों के फैसले में कॉर्पोरेट अपराधों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि कोई कंपनी एक कानूनी इकाई होने के बावजूद आपराधिक मुकदमे का सामना कर सकती है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं होगा। प्रथम दृष्टया ऐसे तथ्य होने चाहिए, जिनसे कंपनी की ओर से काम करने वाले व्यक्ति की आपराधिक मंशा का आधार बन सके।
अब उठ रहा बड़ा सवाल
इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल फैसलों में देरी को लेकर उठ रहा है। जब हाईकोर्ट्स के लिए फैसला सुनाने की समयसीमा पर सख्ती की बात कही जा रही है, तो क्या ऐसी समयसीमा सुप्रीम कोर्ट की पीठों के लिए भी समान रूप से लागू होनी चाहिए?
