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किसान के नाम पर फर्जी आवेदन मामला, हाईकोर्ट ने दिए अधिवक्ता आशीष मिश्रा और प्रशांत शर्मा को नोटिस के आदेश

 

0 तमनार के किसान के नाम पर की गई थी झूठी शिकायत
0 जेएसपीएल के अधिकारी पर लगाया था गलत तरीके से जमीन की रजिस्ट्री का आरोप

रायगढ़. तमनार के एक किसान को धोखे में रखकर जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड के तत्कालीन अधिकारी राकेश जिंदल को जालसाजीपूर्वक बदनाम करने की साजिश का अब भांडा फूटने लगा है। किसान ने स्वयं हाईकोर्ट में उपस्थित होकर बताया कि किस तरह अधिवक्ताओं सहित कुछ लोगों ने उसके नाम का दुरूपयोग करते हुए झूठी शिकायत की। इसे गंभीरता से लेते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने इस मामले में अधीनस्थ न्यायालय में चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी है। साथ ही थाना प्रभारी के माध्यम से रायगढ़ के अधिवक्ता आशीष मिश्रा एवं प्रशांत शर्मा को नोटिस जारी करने के आदेश दिए हैं।
तमनार तहसील के ग्राम कचकोबा निवासी दिव्य सिंह ठाकुर के नाम से मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, रायगढ़ के न्यायालय में 22 सितंबर 2021 को अधिवक्ता आशीष मिश्रा द्वारा एक आवेदन प्रस्तुत किया गया था। इसमें जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड के तत्कालीन अधिकारी राकेश जिंदल पर गलत तरीके से जमीन की रजिस्ट्री कराने का आरोप लगाया गया था। 28 अक्टूबर 2021 को यह मामला न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी, रायगढ़ के न्यायालय में स्थानांतरित हो गया। इस पर सुनवाई करते हुए जेएमएफसी कोर्ट ने राकेश जिंदल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए थे। अगले दिन समाचार पत्रों में खबर पढ़कर दिव्य सिंह ठाकुर को इसके बारे में जानकारी मिली और वे हैरत में पड़ गए, क्योंकि ऐसा कोई आवेदन उन्होंने दिया ही नहीं था। उन्होंने न्यायालय में शपथ पत्र देकर कहा कि मेरे साथ न ही कोई धोखाधड़ी हुई है और न ही कोई झूठा दस्तावेज निष्पादित हुआ है। श्री ठाकुर ने बताया कि उन्होंने ऐसा कोई आवेदन दिया ही नहीं है और न ही किसी शपथपत्र पर उसने हस्ताक्षर किया था। कुछ लोगों ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए साजिशपूर्वक उनके नाम का दुरूपयोग करते हुए फर्जी तरीके से यह आवेदन दिया था।
एफआईआर के आदेश के खिलाफ राकेश जिंदल ने भी छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में अपील की, जिसमें दिव्य सिंह ठाकुर को भी उत्तरवादी बनाया गया। इसकी सुनवाई के दौरान दिव्य सिंह ठाकुर ने खुद हाईकोर्ट में उपस्थित होकर माननीय न्यायाधीष के समक्ष शपथ पत्र देकर बताया कि उसने ऐसी कोई शिकायत पर कभी दस्तखत किए ही नहीं और न ही विचारण न्यायालय में उसके नाम से प्रस्तुत शपथपत्र पर उसके हस्ताक्षर हैं। रायगढ़ के अधिवक्ता आशीष मिश्रा एवं प्रशांत शर्मा ने उसके नाम का दुरूपयोग करते हुए फर्जी तरीके से यह आवेदन दिया था। उन्होंने न तो अधिवक्ताओं के माध्यम से ऐसा कोई आवेदन दिया, न ही ऐसे किसी आवेदन पर दस्तखत किए। उच्च न्यायालय ने इसे गंभीरतापूर्वक लेते हुए निचली अदालत के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। साथ ही उच्च न्यायालय ने थाना प्रभारी के माध्यम से रायगढ़ के अधिवक्ता आशीष मिश्रा एवं प्रशांत शर्मा को नोटिस जारी करने के आदेश दिए हैं।

किसान को दी सच्चाई बताने पर जान से मारने की धमकी
जमीन संबंधी मुआवजा और अन्य औपचारिकताओं के नाम पर छलपूर्वक तमनार के किसान दिव्य सिंह ठाकुर से दस्तावेजों में हस्ताक्षर लेकर अधिवक्ताओं सहित कुछ लोगों ने फर्जी तरीके से कोर्ट में आवेदन प्रस्तुत कर दिया। उनका लक्ष्य उद्योग पर दबाव बनाकर वसूली का था। जब किसान को समाचार पत्रों से इस बारे में पता चला, तो उसने ऐसे किसी आवेदन से साफ इनकार कर दिया। जब किसान ने कोर्ट में स्वयं उपस्थित होकर शपथ पत्र प्रस्तुत किया, तो दरोगापारा निवासी महेन्द्र पाल सिंह ऊर्फ पप्पू सरदार और तमनार निवासी आशुतोष बोहिदार ने पहले उसे रूपयों का लालच दिया और न मानने पर झूठे केस में फंसाने की धमकी देने लगे। उन्होंने लगातार किसान को धमकाना शुरू कर दिया और उनका साथ न देने पर जान से मारने की धमकी देने लगे। भयभीत होकर किसान दिव्य सिंह ठाकुर ने अपने भांजे से उधार लेकर मजबूरन पांच लाख रूपये से अधिक की राशि उसके बताए हुए बैंक खाते में अपनी जान बचाने के लिए दी। कुछ समय पहले एक अन्य मामले में आशुतोष बोहिदार की गिरफ्तारी के बाद किसान की हिम्मत बंधी और उसने पुलिस के पास पहुंचकर पूरे मामले की शिकायत की। साथ ही उसने अपने मोबाइल पर रिकार्ड की गई धमकी वाली कॉल, मैसेज और महेन्द्रपाल सिंह को दिए गए रूपयों के संबंध में सबूत भी प्रस्तुत किए। इस मामले में तमनार पुलिस ने महेन्द्र पाल सिंह के खिलाफ धारा 384, 506,34 के तहत अपराध दर्ज किया है।

अवैध वसूली के लिए चल रहा सिंडीकेट
दरअसल यह पूरा मामला ब्लैकमेलिंग और अवैध वसूली की कोशिश का है। औद्योगिक जिला होने की वजह से रायगढ़ में कई ऐसे लोग व समूह सक्रिय हैं, जिनका लक्ष्य किसी न किसी तरह उद्योगों से उगाही का होता है। कई बार गांव के भोले-भाले किसान इनके झांसे में आकर फंस जाते हैं और उनके नाम का दुरूपयोग करते हुए ये उद्योगों और उनके वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ झूठी शिकायतें कर उन पर दबाव बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं। ऐसे मामलों में अंततः नुकसान किसानों और ग्रामीणों का होता है।

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