CG News: अनुकंपा नियुक्ति में हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, SECL के भेदभावपूर्ण नियमों को पलटा

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CG News: High Court’s historic decision in compassionate appointment, SECL’s discriminatory rules overturned

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने महिलाओं के अधिकारों और अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं दूरगामी फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि अनुकंपा या आश्रित रोजगार के मामलों में महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव संवैधानिक सिद्धांतों के विरुद्ध है।

SECL का फैसला रद्द, नियुक्ति का दिया आदेश

अदालत ने साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के उस निर्णय को खारिज कर दिया है, जिसमें एक कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी विधवा बहन को ‘आश्रित’ न मानते हुए नियुक्ति देने से मना कर दिया गया था। माननीय न्यायालय ने कंपनी को सख्त निर्देश दिया है कि वह विधवा बहन के दावे पर 60 दिनों के भीतर नए सिरे से विचार करे और पात्रता के अनुसार उसे तत्काल नियुक्ति प्रदान करे।

क्या था विवाद और याचिका का आधार?

यह पूरा मामला बीना बिंझवार और उनकी 72 वर्षीय वृद्ध मां लक्ष्मणिया बिंझवार की याचिका से शुरू हुआ। याचिका के अनुसार, बीना के भाई राजाराम SECL के गेवरा प्रोजेक्ट में कार्यरत थे। उनकी नियुक्ति परिवार की जमीन के बदले पुनर्वास नीति के तहत हुई थी। अप्रैल 2022 में एक सड़क दुर्घटना में राजाराम की असामयिक मृत्यु हो गई। राजाराम अविवाहित थे, इसलिए परिवार में केवल उनकी वृद्ध मां और विधवा बहन बीना ही शेष थे, जो पूरी तरह राजाराम की आय पर ही आश्रित थे

लिंग आधारित भेदभाव पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

SECL ने यह तर्क देते हुए दावा खारिज किया था कि कंपनी की नीति में ‘बहन’ को अनुकंपा नियुक्ति के योग्य आश्रितों की सूची में शामिल नहीं किया गया है। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य परिवार को अचानक आए आर्थिक संकट से बचाना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई विधवा बहन अपने भाई पर आश्रित थी, तो उसे केवल लिंग या वैवाहिक स्थिति के आधार पर हक से वंचित करना समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

पुनर्वास नीति और कानूनी हित

अदालत ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि चूंकि यह नौकरी परिवार की भूमि अधिग्रहण के बदले मिली थी, इसलिए इस रोजगार पर परिवार का एक कानूनी और निहित स्वार्थ (vested interest) बनता है। बीना बिंझवार, जिनके पति की मृत्यु 2002 में हो गई थी और जो तब से अपने भाई के साथ रह रही थीं, उन्हें भाई की मृत्यु के बाद बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता। यह फैसला भविष्य में उन सभी महिलाओं के लिए एक मिसाल बनेगा जो कानूनी पेचीदगियों के कारण अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं

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