Discussion over tea
पत्रकार दीपक तिवारी
चर्चा आज किसी नेता अधिकारी या पार्टी की नहीं बल्कि उस आम आदमी की है जो हर चुनाव में लाइन लगाकर वोट देता है टैक्स देता है नियमों का पालन करता है, लेकिन व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ भी वही उठाता है।
कहा जाता है कि कानून सबके लिए बराबर होता है। संविधान की किताब में यह बात बहुत अच्छी लगती है, लेकिन जमीनी हकीकत पर सवाल उठते हैं। जेलों में जाकर देख लीजिए, वहां अधिकांश कैदी गरीब, मजदूर, किसान, बेरोजगार या समाज के कमजोर वर्गों से मिलेंगे। बड़े उद्योगपति, अरबपति और प्रभावशाली लोग अक्सर महंगे वकीलों, राजनीतिक पहुंच और कानूनी संसाधनों के बल पर अपने बचाव के लिए मजबूत व्यवस्था खड़ी कर लेते हैं। यही कारण है कि आम आदमी के मन में यह सवाल बार-बार उठता है कि न्याय की डगर सबके लिए एक जैसी है या नहीं।
आम नागरिक पर नियमों का डंडा तेजी से चलता है। हेलमेट नहीं पहना तो चालान, बिजली का बिल नहीं भरा तो कार्रवाई, छोटा व्यापार किया तो दर्जनों विभागों की जांच। लेकिन जब हजारों करोड़ के घोटालों, बड़े आर्थिक अपराधों या प्रभावशाली लोगों के मामलों की बात आती है तो जनता को अक्सर जांच, अपील और लंबी कानूनी प्रक्रिया का इंतजार करना पड़ता है। इसी असमानता की भावना से लोगों में व्यवस्था के प्रति नाराजगी पैदा होती है।
देश में पिछले वर्षों में बड़े उद्योग समूहों का प्रभाव लगातार बढ़ा है। समर्थक कहते हैं कि बड़े उद्योग रोजगार और विकास लाते हैं, जबकि आलोचकों का आरोप है कि नीतियां अक्सर बड़े पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। सच्चाई चाहे जो हो,लेकिन जब किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी और बेरोजगार युवा अपनी आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हों और दूसरी ओर कुछ लोगों की संपत्ति तेजी से बढ़ती दिखाई दे तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
जनता का दर्द यही है कि लोकतंत्र केवल वोट डालने तक सीमित नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र का अर्थ है कि कानून बनाते समय सबसे पहले उस व्यक्ति के बारे में सोचा जाए जो रोज कमाता है और रोज खाता है। जिस दिन नीति निर्माण में गरीब मध्यम वर्ग किसान मजदूर और छोटे व्यापारी केंद्र में होंगे उस दिन लोगों का व्यवस्था पर भरोसा और मजबूत होगा।
चाय की चुस्कियों के बीच आज का सवाल यही है
क्या हमारे नियम और कानून वास्तव में आम आदमी को न्याय दिलाने के लिए बने हैं या फिर आम आदमी को अनुशासन में रखने और बड़े लोगों को सुविधाएं देने का माध्यम बनते जा रहे हैं
यही बहस है यही चर्चा है, और शायद यही वह सवाल है जिसका जवाब देश की करोड़ों जनता तलाश रही है।
