Discussion over Tea!
पत्रकार दीपक तिवारी
कबीरधाम जिले में इन दिनों चाय ठेलों, चौक-चौराहों और दफ्तरों में एक ही चर्चा जोर पकड़ रही है। चर्चा एक ऐसे पोस्टर और विज्ञापन की है, जिसमें जिले के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और वर्तमान जिला कलेक्टर का नाम किसी सामाजिक संगठन के “राष्ट्रीय महासचिव” जैसे बड़े पद के साथ बताया जा रहा है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या कोई जिला कलेक्टर अपने प्रशासनिक पद पर रहते हुए किसी सामाजिक संगठन में इतना बड़ा पद संभाल सकता है?
चाय की चुस्कियों के बीच लोग अपने-अपने तरीके से नियम-कानून समझा रहे हैं। कोई कह रहा है कि सामाजिक संस्था में सदस्य रहना अलग बात है, लेकिन राष्ट्रीय महासचिव जैसे सक्रिय पद पर रहना सेवा आचरण नियमों के खिलाफ माना जा सकता है। वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि यदि शासन से अनुमति हो और संस्था पूरी तरह गैर-राजनीतिक एवं गैर-व्यावसायिक हो, तब सीमित भूमिका संभव हो सकती है।
जानकारों की मानें तो All India Services Conduct Rules के तहत आईएएस अधिकारियों को निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी होता है। नियम यह भी कहते हैं कि कोई अधिकारी ऐसा पद नहीं ले सकता जिससे हितों का टकराव पैदा हो या प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल उठे। खासकर “राष्ट्रीय महासचिव”, “राष्ट्रीय अध्यक्ष” या “प्रदेश प्रभारी” जैसे पद सक्रिय संचालन और प्रभाव वाले माने जाते हैं।
चर्चा यह भी है कि यदि कोई अधिकारी किसी संगठन में पदाधिकारी बनता है तो क्या शासन से पूर्व अनुमति ली गई? क्या वह पद केवल मानद है या सक्रिय? क्या उस संगठन का संबंध सामाजिक गतिविधियों तक सीमित है या उसका प्रभाव राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों तक भी है? यही सवाल अब लोगों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
कई लोग यह भी कहते नजर आ रहे हैं कि एक जिला कलेक्टर पूरे जिले का प्रशासन संभालता है, ऐसे में किसी बाहरी संगठन में सक्रिय पद पर रहने से निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। वहीं कुछ लोग इसे केवल सामाजिक जुड़ाव बताकर सामान्य मामला मान रहे हैं।
अब सच्चाई क्या है, अनुमति है या नहीं, नियमों का पालन हुआ है या
नहीं — यह तो संबंधित विभाग और शासन ही स्पष्ट कर सकता है। लेकिन फिलहाल कबीरधाम में चाय पर चर्चा का सबसे गर्म विषय यही बना हुआ है कि “क्या एक जिला कलेक्टर सामाजिक संगठन का राष्ट्रीय महासचिव रह सकता है?

