चाय पर चर्चा!

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Discussion over Tea

पत्रकार दीपक तिवारी

चाय की दुकानों से लेकर चौपाल तक इन दिनों ग्राम बहेराखार की जमीन का मामला खूब गरमाया हुआ है। हर कप चाय के साथ एक ही सवाल उठ रहा है — आखिर 100 एकड़ जमीन का खेल हुआ कैसे?

गांव के लोगों के मुताबिक, इस पूरे मामले में बड़ा घपला हुआ है। करीब 100 एकड़ जमीन, जिसमें से लगभग 85.75 एकड़ सरकारी घास भूमि बताई जा रही है, उसे कथित रूप से सेटिंग करके बिल्डर के नाम चढ़ा दिया गया। चर्चा है कि इस खेल में तहसील स्तर के जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा काम संभव ही नहीं था।

मामला यहीं खत्म नहीं होता। ग्रामीणों का कहना है कि इस जमीन में सिर्फ चरागाह ही नहीं, बल्कि तालाब, पड़त भूमि और यहां तक कि श्मशान घाट जैसी सार्वजनिक उपयोग की जमीन भी शामिल है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या गांव की आत्मा मानी जाने वाली इन जमीनों को भी सौदेबाजी का हिस्सा बना दिया गया?

चर्चा में अब कानूनी पहलू भी जुड़ गया है। लोग कह रहे हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील में जसपाल सिंह बनाम पंजाब शासन के मामले में साफ कहा था कि गांव की सार्वजनिक भूमि (कॉमन लैंड) की विशेष सुरक्षा होनी चाहिए और उसका दुरुपयोग या निजीकरण नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों की गहराई से जांच जरूरी है।

अब बहेराखार के लोग भी यही सवाल उठा रहे हैं — जब सुप्रीम कोर्ट का इतना स्पष्ट निर्देश है, तो फिर यहां सरकारी जमीन को किस आधार पर निजी नाम पर चढ़ा दिया गया? कौन जिम्मेदार है? किसने फाइल आगे बढ़ाई? और किसके इशारे पर यह सब हुआ?

बताया जा रहा है कि इस मामले को लेकर ग्रामीण पहले भी कलेक्टर से मिल चुके हैं और जांच की मांग कर चुके हैं, लेकिन अब तक ठोस कार्रवाई नहीं होने से लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।

चाय की चर्चा अब सिर्फ चर्चा नहीं रही, बल्कि लोगों की जुबान पर एक ही बात है —

“अगर श्मशान और तालाब भी बिकने लगे, तो गांव बचेगा कैसे?”

अब सबकी नजर प्रशासन पर टिकी है कि क्या इस मामले में सच सामने आएगा या फिर यह भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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