Discussion over tea
पत्रकार दीपक तिवारी
कहते हैं कि बहता पानी साफ रहता है, लेकिन जो पानी एक ही जगह ठहर जाए उसमें काई जमने लगती है। ठीक उसी तरह जब किसी सरकारी विभाग में कोई अधिकारी या कर्मचारी वर्षों तक एक ही जिले या एक ही कुर्सी पर जमा रहता है, तो धीरे-धीरे उसके चारों तरफ प्रभाव, पहुंच और रिश्तों का ऐसा जाल बन जाता है कि उसे हटाना आसान नहीं रह जाता।
विश्वास सूत्र बताते हैं कि लंबे समय तक एक ही जगह रहने वाले कुछ अधिकारी और कर्मचारी अपने विभाग को सेवा का केंद्र कम और प्रभाव का केंद्र ज्यादा बना लेते हैं। समय के साथ उनकी पकड़ इतनी मजबूत हो जाती है कि फाइलें भी उनके इशारे पर चलती हैं और नियम-कानून भी उनकी सुविधा के अनुसार व्याख्यायित होने लगते हैं।
चर्चा यह भी है कि ऐसे मामलों में कुछ स्थानीय नेताओं, दलालों और प्रभावशाली लोगों का भी संरक्षण मिलता है। यही कारण है कि स्थानांतरण की सूची बनती है, आदेश निकलते हैं, लेकिन कई चेहरे सालों तक वहीं दिखाई देते हैं। सवाल उठता है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि कुछ कुर्सियां और कुछ चेहरे एक-दूसरे से अलग ही नहीं हो पाते?
सबसे ज्यादा परेशानी आम जनता को होती है। गरीब, किसान, मजदूर और सामान्य नागरिक जिन्हें नियमों और प्रक्रियाओं की पूरी जानकारी नहीं होती, वे कार्यालयों के चक्कर काटते रहते हैं। उनकी छोटी-छोटी समस्याएं महीनों तक लटकती रहती हैं, जबकि पहुंच और पहचान वालों के काम चुटकियों में निपट जाते हैं।
चाय की टपरी पर चर्चा है कि जहां नियमित स्थानांतरण नहीं होता, वहां पारदर्शिता भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है। विभाग के अंदर जवाबदेही खत्म होने लगती है और भ्रष्टाचार को पनपने का अवसर मिल जाता है। कई बार नए अधिकारी भी पुराने नेटवर्क के सामने बेबस नजर आते हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी विभागों में एक निश्चित समय सीमा के बाद अनिवार्य स्थानांतरण की व्यवस्था और सख्ती से लागू होनी चाहिए? क्या वर्षों से एक ही जगह जमे अधिकारियों और कर्मचारियों की समीक्षा होनी चाहिए? और क्या आम जनता को राहत दिलाने के लिए इस व्यवस्था में बड़े सुधार की जरूरत है?
चाय पर चर्चा जारी है… क्योंकि जब कुर्सी स्थायी हो जाए, तो सवाल उठना भी जरूरी हो जाता है।
