WEST BENGAL SIR CASE : सुप्रीम कोर्ट सख्त, एक हफ्ते का अतिरिक्त टाइम

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WEST BENGAL SIR CASE : Supreme Court strict, one week extra time

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख दिखाया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कर दिया कि मतदाता सूची की प्रक्रिया में न तो ढिलाई चलेगी और न ही किसी तरह की बाधा बर्दाश्त होगी।

कोर्ट ने 14 फरवरी के बाद एक हफ्ते का अतिरिक्त समय देते हुए कहा कि सत्यापन की प्रक्रिया तय समय में पूरी की जाए। साथ ही, फॉर्म-7 से जुड़ी आपत्तियों को जलाने और चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालने के आरोपों पर राज्य के DGP को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया गया है।

8505 अधिकारी तत्काल रिपोर्ट करें

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि चुनाव आयोग को प्रतिनियुक्त किए गए 8505 अधिकारी जिला निर्वाचन कार्यालयों में तय समय सीमा तक रिपोर्ट करें। कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव के लिए प्रशासनिक सहयोग बेहद जरूरी है।

दस्तावेजों पर भी साफ निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी के अपने आदेश को दोहराते हुए कहा कि जिन दस्तावेजों का उल्लेख किया गया था, उन्हें दावों और आपत्तियों की जांच में स्वीकार किया जाएगा। माध्यमिक परीक्षा प्रमाणपत्र और एडमिट कार्ड को संयुक्त रूप से पहचान प्रमाण माना जाएगा। आधार कार्ड और अन्य वैध दस्तावेज भी स्वीकार किए जाएंगे।

पुलिस कार्रवाई पर सवाल

चुनाव आयोग ने आरोप लगाया था कि फॉर्म-7 से जुड़ी आपत्तियों को रोकने या जलाने की घटनाओं पर पुलिस ने उचित कार्रवाई नहीं की। इस पर कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाते हुए DGP से व्यक्तिगत स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने याद दिलाया कि पहले ही आदेश में पुलिस को चुनाव प्रक्रिया में किसी भी तरह की बाधा रोकने के निर्देश दिए गए थे।

अधिकारियों की नियुक्ति पर भी नजर

सुनवाई में ERO और AERO की नियुक्ति पर भी सवाल उठे। राज्य सरकार ने बताया कि 292 ERO अधिकारियों की सूची भेजी गई है और हजारों सहायक अधिकारी तैनात हैं। कोर्ट ने साफ किया कि यदि कोई अधिकारी अनुपयुक्त पाया जाता है तो उसे बदला जा सकता है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा, “हम रुकावटें हटाएंगे, लेकिन SIR प्रक्रिया को पूरा होने से नहीं रोकेंगे।” अदालत ने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर चुनाव आयोग की शक्तियों पर अंतिम फैसला भी लिया जा सकता है।

अब सबकी नजर इस पर है कि राज्य सरकार और प्रशासन कोर्ट के निर्देशों पर कितनी तेजी से अमल करते हैं।

 

 

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