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चिंतामुक्त जीवन जीने का मंत्र है वर्तमान में जिएंः राष्ट्रसंत ललितप्रभजी

आज प्रवचन ‘कैसा करें आहार कि स्वस्थ रहे परिवार’ विषय पर
रायपुर। ‘‘प्रतिकूलता में भी चिंतामुक्त जीवन जीने का पहला मंत्र है- भूलें बंद द्वार और खोजें खुला द्वार। क्योंकि ऊपर वाला कभी भी सौ द्वार एक साथ बंद नहीं करता, 99 द्वार बंद हों तो एक न एक द्वार जरूर खुला रहता है, उस खुले द्वार को देखिए। जो हमें जन्म देता है, वह हमें जीने की व्यवस्था भी देता है। दूसरा मंत्र है- जिंदगी से हमेशा के लिए भय का भूत भगा दीजिए। क्योंकि जो जिंदगी को निर्भय होकर जीता है वो सिर्फ एक बार मरता है और जो भयभीत होता है वह रोज-रोज मरता है। तीसरा मंत्र है- बीती बातों को छोटी-छोटी बातों को लेकर ज्यादा सिर खपाई या चिंता न करें। चैथा मंत्र है- ईश्वर की व्यवस्थाओं में भरोसा करें। क्योंकि ऊपर वाले की हर रचना में हमारी भलाई निहित होती ही है। तनावमुक्त जीवन जीने का पांचवा मंत्र है- हमेशा वर्तमान में जीएं। हर हाल में मस्त-मगन और हर हाल में प्रसन्न रहें। क्योंकि वह हमें केवल वही नहीं दे सकता, जो हम पसंद करते हैं, हम उसे पसंद कर लें जो उसने हमें दिया है। इस सूत्र को जो अपने जीवन में अपना लेता है वो कभी जीवन में दुखी नहीं होता।’’ ये प्रेरक उद्गार राष्ट्रसंत महोपाध्याय श्रीललितप्रभ सागरजी महाराज ने आउटडोर स्टेडियम बूढ़ापारा में जारी दिव्य सत्संग ‘जीने की कला’ के अंतर्गत स्वास्थ्य सप्ताह के प्रथम दिवस सोमवार को ‘कैसे जिएं चिंता एवं तनावमुक्त जीवन’ विषय पर व्यक्त किए।

 

जहां समस्या है वहां समाधान भी है
संतप्रवर ने आगे कहा कि जिंदगी की समस्याएं उुंटों के बाड़े की तरह है, जो चार को बैठाओगे तो चैदह नई खड़ी हो जाएंगी। इसीलिए आने वाली समस्याओं को लेकर इंसान को कभी घबराना नहीं चाहिए। हमेशा ये याद रखें कि जहां-जहां समस्याएं हैं, वहां-वहां समाधान के रास्ते भी हैं। दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं, जिसे कोई समस्या न हो और दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका कोई समाधान न हो।
चिंता यमराज की बेटी है और तनाव बेटा
विषयान्तर्गत संतश्री ने कहा कि छोटी-छोटी बातों को लेकर हम लोग अक्सर मानसिक तनाव पाल लेते हैं और उन चिंताओं में उलझ जाते हैं। मुझसे यदि कोई पूछे कि दुनिया में सबसे ज्यादा फैला हुआ रोग कौन सा है? तो मैं कहुंगा कि वह है आदमी के तनाव का रोग। थोड़ा या ज्यादा हर इंसान के भीतर यह रहता है। जिंदगी ऊपर वाले का दिया वरदान है, हम चाहें तो इसे आनंद, प्रेम और मिठास से जी सकते हैं और हम चाहें तो इसे चिंता, नफरत, ईष्र्या, तनाव से भरकर भी जी सकते हैं। जिंदगी में 99 परसेंट समस्याएं वे होती हैं, जिन्हें हम खुद पैदा करते हैं, ऊपर वाला उन्हें हमें नहीं देता है। स्मरण रहे चिंता यमराज की बेटी है और तनाव उसी का बेटा है। ये ऐसे दो तत्व इंसान के भीतर ऐसे आते हैं, जिस प्रकार घुन गेंहूं में आने पर भीतर ही भीतर उसे खाकर खत्म कर देता है।
भय की गं्रथी, अनिर्णय की स्थिति का नाम है चिंता
चिंता के कारणों को स्पष्ट करते हुए संतश्री ने कहा कि बार-बार किसी एक चीज पर किया गया अनिर्णयमूलक चिंतन ही एक दिन चिंता बन जाता है। चिंतन मनुष्य के जीवन के लिए लाभकारी होता है और चिंता नुकसानदायी। चिंतन मनुष्य को उध्र्वमुखी बनाता है और चिंता आदमी को नीचे गिराती है। आदमी के भीतर में चलने वाली भय की ग्रंथी और अनिर्णय की स्थिति का बने रहने का नाम ही चिंता है। चिंता हमारे मन की शांति को खत्म करती है। मन जब अशांत होता है तो उसे 56 भोग भी फिके लगते हैं और जब शांत या आनंद-खुशियों से भरा होता है तो दाल-रोटी में भी छप्पन भोग का आनंद आता है।

 

जब जो होना है, तब वो होता है
टेंशन फ्री लाइफ जीने का सूत्रवाक्य देते हुए संतप्रवर ने कहा कि जब जो होना है, तब वो होता है। मेरे किए होता नहीं और मेरे रोके रूकता नहीं। ऐसा मानस बनाकर जीवन जीएं। क्योंकि आपकी चिंता या तनाव करने से घटित होने वाली घटना को रोका नहीं जा सकता। भगवान पर भरोसा करो, उस पर सब छोड़ दो, आज नहीं तो कल आपका काम जरूर हो जाएगा। ऊपर वाले की व्यवस्था मंें कोई न कोई संयोजन छिपा होता है, हम ही हैं कि उसकी व्यवस्थाओं को समझ नहीं पाते। इंसान चिंताओं का मकड़जाल खुद ही अपने आसपास बुन लेता है।
सारी चिंताएं कर दें ऊपर वाले के हवाले
सहज आनंद से भरे जीवन का पाठ पढ़ाते हुए संतश्री ने कहा कि हमेशा ध्यान रखें, न बीते कल में जीओ न आने वाले कल में जीओ, जी सको तो वर्तमान में जीओ। अभी का आनंद लो। बीते कल और आने वाले कल को लेकर बार-बार सोचते रहना, इसी का नाम चिंता है। जो व्यक्ति अपने जीवन को जितनी सहजता से जीता है, वह उतने आनंदमय जीवन का मालिक होता है। भगवान के सामने हाथ जोड़कर यह प्रार्थना कर लें कि आज से मैं टंेशन फ्री हो रहा है, अपनी सब चिंताएं, फिक्र मैं तेरे हवाले कर रहा हूं, आज देख लेना छह महीने में क्या चमत्कार होता है। तू उसके हवाले करके तो देख फिर तेरा काम कैसे निपट जाता है। ऊपर वाला भी गजब है, वह सोचता है कि यही इतना सोच रहा है तो मैं इसके लिए क्यों सोचूं। यदि आपकी मनोदशा अच्छी है तो भगवान के बनाए सातों दिन आपके लिए अच्छे हैं। अगर उस पर भरोसा है तो लिखे हुए किसी विघ्न-बाधा की बातों को पढ़कर आप चिंता में क्यों पड़ते हैं। बिगड़े काम सुधारने के लिए आपके पास केवल दो हाथ हैं, और उसके पास हजारों हाथ हैं। हजार हाथ वाले के साथ आप दो हाथ वाले कहां बुद्धि लगा रहे हो। एक बार उसके भरोसे स्वयं को देकर तो देखो, तुम्हारा काम कैसे निपटता है पता ही नहीं चलेगा।चिंता व तनाव के हैं ये दुष्परिणाम
चिंता व तनाव के दुष्परिणामों से अवगत कराते हुए संतप्रवर ने कहा- चिंता व तनाव से आंखें, स्मरण शक्ति, पेट नाड़ियां-पाचन तंत्र कमजोर हो जाते हैं आदमी के। भूख लगना कम हो जाती है, उल्टी-दस्त लगने शुरू हो जाते हैं, बीपी हाई, सुगर असंतुलित होना शुरू हो जाता है, यह सब कब जब आदमी चिंता और तनाव में होता है। चिंता और तनावमुक्त जीवन कैसे जीएं, इसका मंत्र अगर हम सीखना चाहते हैं तो नंबर एक- यह तय कर लो, जो हो रहा है वह प्रभु का प्रसाद है मैं प्रसाद को कभी विषाद मानकर मन में तनाव पैदा नहीं करूंगा। जब वो दिन भी बीत गए तो ये दिन भी बीत जाएंगे। अगर अच्छे दिन आए हैं तो ज्यादा गौरव मत करो क्योंकि ये दिन भी बीत जाएंगे और कोई बुरा दिन आ गया है तो टेंशन मत पालो, ये दिन भी निकल जाएगा। जो व्यक्ति जीवन में घटने वाली घटनाओं को प्रभु का दिया प्रसाद मानकर सहजता से स्वीकार कर लेता है वह जीवन में कभी दुखी नहीं होता।
जो मेरा है वो जाएगा नहीं, जो चला गया वो मेरा था ही नहीं
प्रतिकूलता में खुद को मोटिवेट करने का एक ही तरीका बताते हुए संतश्री ने कहा- इस मंत्र को जीवन में जोड़ लंे कि, जो मेरा है वो जाएगा नहीं और जो चला गया वो मेरा था ही नहीं। परिस्थिति कैसी रहेगी यह हमारे हाथ में नहीं है पर बिगड़ती परिस्थिति में भी हमारी मनःस्थिति कैसी रहे, यह जरूर हमारे हाथ में है। महापुरूष और सामान्य व्यक्ति में फर्क केवल इतना ही है कि चाहे जैसी परिस्थिति हो उनकी मनःस्थिति कभी बिगड़ती नहीं। लेकिन हमारी परिस्थिति के साथ मनःस्थिति भी बिगड़ जाती है। अपने भीतर यही पावन भावनाएं भरे रखिए, जैसे ऋतुएं बदलती हैं, वैसे ही आदमी का भाग्य भी बदलता रहता है, पर बदलते हुए भाग्य में जो हो रहा है उसका आनंद ले लें। बचपन में पढ़ाई की चिंता, पढ़ाई हो गई तो परीक्षा परिणाम की चिंता, पास हो गए तो बड़े होने के बाद जाॅब की चिंता, फिर कमाई की चिंता, फिर लुगाई की चिंता, फिर बूढ़ा हो गया तो बुढ़ापे की चिंता, बीमार हो गया तो बीमारी की चिंता, मरने के करीब पहुंच गया तो मरने की चिंता, मरते-मरते भी चिंता कि नर्क में जाउुंगा या स्वर्ग में। हर कहीं चिंता ही चिंता। पर हर हाल में जो इंसान यह मंत्र अपने जीवन से जोड़ लेता है कि मैं चिंतामुक्त जीवन जीउुंगा, तब इंसान जिंदगी की 90 परसेंट बाधाओं से यूं ही निकल जाता है। अपने जीवन का आनंद हर हाल में बनाए रखें। लोग क्या कहेंगे इस चिंता में मत पड़िए। लोगों की यह आदत है, तुम्हारे सामने मीठा-मीठा कहेंगे और तुम्हारे पीठ पीछे नमक-मिर्च लगाकर बातें करेंगे।
जिंदगी जीने का फलसफा- यह भी बीत जाएगा
उन्होंने कहा- यह भी बीत जाएगा। दिज टू विल पास्ट। यही जीवन का महान मंत्र है। अगर सुख की बेला आए तो इतराना मत, यह भी बीत जाने वाला है। और यदि दुख आए तो घबराना मत क्योंकि यह भी बीत जाएगा। सुख आए तो हंस लो और दुख आए तो टाल दो यह कहकर कि यह भी बीत जाएगा- नो प्राॅब्लम। जिंदगी जीने का यही फलसफा है।
चिंतामुक्त जीवन जीने के ये हैं मंत्र
संतश्री ने श्रद्धालुओं को आज चिंतामुक्त जीवन जीने के पांच मंत्र प्रदान किए। जिनमें पहला मंत्र है- भूलें बंद द्वार और खोजें खुला द्वार। क्योंकि ऊपर वाला कभी भी सौ द्वार एक साथ बंद नहीं करता, 99 द्वार बंद हों तो एक न एक द्वार जरूर खुला रहता है, उस खुले द्वार को देखिए। जो हुआ है उसका आनंद लीजिए। जो हमें जन्म देता है, वह हमें जीने की व्यवस्था भी देता है। दूसरा मंत्र है- जिंदगी से हमेशा के लिए भय का भूत भगा दीजिए। क्योंकि पूरी जिंदगी में आदमी सिर्फ एक बार ही मरता है। जो जिंदगी को निर्भय होकर जीता है वो सिर्फ एक बार मरता है और जो भयभीत होता है वह रोज-रोज मरता है। डरे वो जो गलत करे। इसीलिए भगाए भय का भूत। तीसरा मंत्र है- छोटी-छोटी बातों को लेकर ज्यादा सिर खपाई मत करो। बीती बातों को लेकर बार-बार चिंता मत करो अन्यथा तनाव की बीमारी का शिकार हो जाओगे। जो बीत गई सो बीत गई…। चैथा मंत्र है- ईश्वर की व्यवस्थाओं में भरोसा कीजिए। क्योंकि जीवन में हमारे साथ वही होता है जो हमारे साथ होना होता है, उुपर वाले की हर रचना में हमारी भलाई ही है। तनावमुक्त जीवन जीने का पांचवा मंत्र है- जीवन में हमेशा यह ध्यान रखें, सदा वर्तमान में जीएं। हर हाल में मस्त-मगन और हर हाल में प्रसन्न रहें। क्योंकि वह हमें केवल वही नहीं दे सकता, जो हम पसंद करते हैं, हम उसे पसंद कर लें जो उसने हमें दिया है। इस सूत्र को जो अपने जीवन में अपना ले वो आदमी कभी जीवन में दुखी नहीं होगा।
धर्मसभा के आरंभ में श्रद्धेय संतश्री ने राष्ट्रीय संत श्रीचंद्रप्रभजी रचित गीत ‘सफर कितना भी मुश्किल हो, प्रभु आसान कर देंगे। जो तुझसे हो न पाएगा, अरे भगवान कर देंगे…’ के गायन से श्रद्धालुओं को चिंता व तनावमुक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी।
निरोगी काया का आधार-अच्छा आहारः डॉ. मुनि शांतिप्रियजी
दिव्य सत्संग के पूर्वार्ध में डॉ. मुनिश्री शांतिप्रिय सागरजी ने कहा कि शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक प्रसन्नता से बढ़कर और कोई दौलत इस दुनिया में नहीं है। अमीर है लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं तो वह अमीरी भी किसी काम नहीं, एक झोपड़ी में रहने वाला यदि स्वस्थ है तो वह कोठी में रहने वाले से ज्यादा सुखी है। निरोगी काया का आधार हमारा अच्छा आहार है। आहार ही हमें अच्छा स्वास्थ्य भी देता है और असंतुलित आहार ही हमें बीमारियां भी देता है। आज आदमी की गजब की फितरत है कि वह पहले पैसा कमाने के लिए स्वास्थ्य को दांव पर लगा देता है और फिर स्वास्थ्य को पाने के लिए वापस पैसे को दांव पर लगा देता है। याद रखें जितना जरूरी जीवन में पैसा है, उतना ही जरूरी स्वास्थ्य भी है। हमारी जीवन शैली ऐसी हो कि हमें कभी काले और खाकी कोट वालों के पास ना जाना पड़े और आहार ऐसा लें कि कभी सफेद कोट वालों के पास ना जाना पड़े। जो सात्विक संयमित आहार लेते हैं वे सदा स्वस्थ रहते हैं। जो व्यक्ति हित-मित और अल्प आहार करता है, उसे कभी चिकित्सक के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ती। स्वयं ही स्वयं का डाॅक्टर हुआ करता है।
इन अतिथियों ने किया दीप प्रज्जवलन
सोमवार की दिव्य सत्संग सभा का शुभारंभ अतिथिगण विनोद प्रजापति जोधपुर, विमल राजेंद्र गोलछा, पुखराज मुणोत, शांतिलाल पोरवाल, संजय कोचर, सहनाम, सुशील सन्नी अग्रवाल, प्रमोद पारख ने दीप प्रज्जवलित कर किया। अतिथि सत्कार श्रीऋषभदेव मंदिर ट्र्स्ट के कार्यकारी अध्यक्ष अभय भंसाली व पीआरओ समिति के मनोज कोठारी द्वारा किया गया। सभी अतिथियों को श्रद्धेय संतश्री के हस्ते ज्ञानपुष्प स्वरूप धार्मिक साहित्य भेंट किये गये। सूचना सत्र का कुशल संचालन चातुर्मास समिति के महासचिव पारस पारख ने किया।

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