मुंबई : महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से चले आ रहे एक बड़े कानूनी मामले में राकांपा नेता और मंत्री छगन भुजबल को बड़ी राहत मिली है। मुंबई की एक विशेष अदालत ने महाराष्ट्र सदन निर्माण से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि भुजबल के खिलाफ आरोप तय करने लायक ठोस सबूत पेश नहीं किए जा सके।
यह मामला वर्ष 2005-06 का है। उस समय भुजबल महाराष्ट्र सरकार में लोक निर्माण विभाग के मंत्री थे। आरोप था कि नई दिल्ली में महाराष्ट्र सदन के निर्माण का ठेका एक निजी कंपनी को गलत तरीके से दिया गया। प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने दावा किया था कि इस सौदे के बदले भुजबल और उनके परिजनों को कथित रूप से रिश्वत मिली थी, जिसे मनी लॉन्ड्रिंग बताया गया।
ईडी के आरोप और कोर्ट की टिप्पणी
ईडी का आरोप था कि निर्माण कंपनी केएस चमनकर ने भुजबल परिवार को किकबैक दिया। जांच एजेंसी के मुताबिक यह पैसा उन कंपनियों में भेजा गया, जिनमें भुजबल के बेटे पंकज भुजबल और भतीजे समीर भुजबल निदेशक थे। हालांकि अदालत ने कहा कि ईडी इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई पुख्ता साक्ष्य पेश नहीं कर सकी, जिससे मनी लॉन्ड्रिंग का मामला टिक सके।
चार्टर्ड अकाउंटेंट को भी राहत
इस मामले से जुड़े एक अन्य अहम फैसले पहले ही आ गया था। उसमें बॉम्बे हाईकोर्ट ने छगन भुजबल और उनके परिवार के चार्टर्ड अकाउंटेंट श्याम राधाकृष्ण मालपानी को भी मनी लॉन्ड्रिंग केस से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल ऑडिट में लापरवाही को मनी लॉन्ड्रिंग अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऑडिटर की भूमिका जांच एजेंसी जैसी नहीं होती।
पुराना मामला, लंबी कानूनी लड़ाई
ईडी ने यह केस वर्ष 2015 में एसीबी की शिकायत के आधार पर दर्ज किया था। इसी मामले में छगन भुजबल को 2015 में गिरफ्तार किया गया था और वह 2018 तक जेल में रहे, बाद में उन्हें जमानत मिली। 2021 में विशेष अदालत ने एसीबी से जुड़े मामलों में भुजबल, उनके बेटे, भतीजे और अन्य आरोपियों को बरी कर दिया था। अब मनी लॉन्ड्रिंग केस में भी बरी होने से भुजबल को बड़ी कानूनी और राजनीतिक राहत मिली है।
