Grand National Legal Seminar “Vidhi Vimarsh” Organized at Shri Rawatpura Sarkar University
रायपुर। श्री रावतपुरा सरकार विश्वविद्यालय, रायपुर के विधि संकाय द्वारा साई प्रेक्षा गृह (आस्था मंच) में एक दिवसीय राष्ट्रीय विधिक संगोष्ठी “विधि विमर्श” का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय था – “कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आपराधिक अन्वेषण एवं डिजिटल फॉरेंसिक : न्याय प्रशासन को पुनर्परिभाषित करते हुए”। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य न्याय प्रशासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आपराधिक अन्वेषण, डिजिटल फॉरेंसिक एवं डिजिटल साक्ष्यों की बढ़ती भूमिका पर शैक्षणिक विमर्श को प्रोत्साहित करना तथा विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं विधि विशेषज्ञों को समकालीन विधिक चुनौतियों से परिचित कराना था।
इस कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रविशंकर जी महाराज के संरक्षण में किया गया। कार्यक्रम के संरक्षक विश्वविद्यालय के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री विशाल गर्ग एवं कुलपति प्रो. सौरभ चतुर्वेदी रहे। सह-संरक्षक के रूप में प्रो. मनीष उपाध्याय (डीन अकादमिक) तथा डॉ. अमृत अनिल राव पुरोहित (कुलसचिव) उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. श्रद्धा पाण्डेय, अधिष्ठाता, विधि संकाय एवं डॉ. अभिषेक कुमार मिश्रा, विभागाध्यक्ष, विधि संकाय द्वारा किया गया। आयोजन सचिव के रूप में श्री मनीष कुमार साहू एवं सुश्री शारदा कुंभकार, सहायक प्राध्यापक, विधि संकाय ने सफलतापूर्वक समस्त व्यवस्थाओं का संचालन किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं छत्तीसगढ़ राज्य गीत के सामूहिक गायन के साथ हुआ। इसके पश्चात सभी अतिथियों का पुष्पगुच्छ भेंट कर आत्मीय स्वागत एवं सम्मान किया गया।
स्वागत उद्बोधन देते हुए विधि संकाय की अधिष्ठाता डॉ. श्रद्धा पाण्डेय ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं डिजिटल परिवर्तन के इस युग में न्याय प्रणाली तीव्र गति से विकसित हो रही है। ऐसे में विधि के विद्यार्थियों के लिए नवीन तकनीकों एवं उनके विधिक प्रभावों की समुचित समझ विकसित करना अत्यंत आवश्यक है।
इसके उपरांत विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अमृत अनिल राव पुरोहित ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक उत्कृष्टता, अनुसंधान, नवाचार एवं बहुविषयक शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विश्वविद्यालय सदैव गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं बौद्धिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए समर्पित है।
अपने प्रेरणादायी उद्घाटन उद्बोधन में कुलपति प्रो. सौरभ चतुर्वेदी ने कहा कि भविष्य की न्याय प्रणाली तकनीक आधारित होगी, इसलिए विधि व्यवसाय से जुड़े लोगों को बदलती तकनीकों के अनुरूप स्वयं को तैयार करना होगा। उन्होंने विद्यार्थियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर विधि, डिजिटल साक्ष्य एवं उभरती विधिक तकनीकों में दक्षता अर्जित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को नवाचार, अनुसंधान एवं आलोचनात्मक चिंतन के केंद्र के रूप में विकसित होना चाहिए, जहाँ विधि एवं तकनीक साथ-साथ आगे बढ़ें। उन्होंने इस समसामयिक विषय पर राष्ट्रीय विधिक संगोष्ठी आयोजित करने के लिए विधि संकाय की सराहना करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजन विधिक अनुसंधान, नीति-निर्माण एवं न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
उद्घाटन सत्र के प्रथम वक्ता डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, प्रोफेसर एवं डीन, हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एचएनएलयू), रायपुर ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आपराधिक अन्वेषण एवं डिजिटल फॉरेंसिक के विधिक एवं न्यायिक पहलुओं पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने तकनीक के उत्तरदायित्वपूर्ण एवं नैतिक उपयोग पर बल देते हुए कहा कि तकनीकी नवाचार और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
इसके पश्चात डॉ. वर्णिका शर्मा, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने डिजिटल युग में बाल अधिकारों की सुरक्षा, बच्चों के विरुद्ध साइबर अपराधों की रोकथाम तथा तकनीक के जिम्मेदार उपयोग पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण सुनिश्चित करने हेतु जन-जागरूकता एवं संस्थागत समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।
इसके बाद न्यायमूर्ति दीपक कुमार तिवारी (सेवानिवृत्त), पूर्व न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने न्यायिक प्रक्रिया में डिजिटल साक्ष्यों की स्वीकार्यता, न्याय प्रणाली में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की उपयोगिता तथा न्यायिक विवेक की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी एवं पारदर्शी बना सकती है, किन्तु न्याय के मूल सिद्धांतों, विधिक प्रक्रिया एवं संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सर्वोपरि रहनी चाहिए।
उद्घाटन सत्र के अंत में प्रो. मनीष उपाध्याय, डीन अकादमिक ने आभार प्रदर्शन करते हुए सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
भोजनावकाश के पश्चात तकनीकी सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल फॉरेंसिक, साइबर अपराध अन्वेषण एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के व्यावहारिक एवं समकालीन आयामों पर विस्तृत चर्चा हुई।
तकनीकी सत्र के प्रथम वक्ता डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने आपराधिक अन्वेषण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका, डिजिटल फॉरेंसिक की उपयोगिता, साइबर अपराध जांच की आधुनिक तकनीकों तथा डिजिटल साक्ष्यों के न्यायिक महत्व पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग की चुनौतियों का प्रभावी समाधान करने के लिए विधि विशेषज्ञों को तकनीकी दक्षता विकसित करनी होगी।
इसके पश्चात सावित्री पाण्डेय, अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय ने ऑनलाइन माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विधिक व्यवस्था, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, साइबर न्यायशास्त्र एवं डिजिटल न्याय व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि न्याय तक प्रभावी पहुँच सुनिश्चित करने के लिए विधि व्यवसाय से जुड़े लोगों में तकनीकी जागरूकता अत्यंत आवश्यक है।
इसके बाद चीन से जुड़े शोधार्थी एफ. एनटानी ने ऑनलाइन माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं डिजिटल फॉरेंसिक पर वैश्विक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए विभिन्न देशों की विधिक व्यवस्थाओं एवं आपराधिक न्याय प्रणाली में उन्नत तकनीकों के बढ़ते उपयोग पर प्रकाश डाला।
तकनीकी सत्र के अंतिम वक्ता अशोक कुमार शर्मा, पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने वर्चुअल माध्यम से आपराधिक मामलों में डिजिटल साक्ष्यों की भूमिका, वैज्ञानिक अनुसंधान की आवश्यकता तथा न्यायालयों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के मूल्यांकन के बदलते मानकों पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि तकनीक ने जांच प्रक्रिया को अधिक सशक्त बनाया है, किंतु न्यायिक विवेक एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत सदैव सर्वोपरि रहेंगे।
तकनीकी सत्र के समापन पर विधि संकाय के विभागाध्यक्ष डॉ. अभिषेक कुमार मिश्रा ने सभी विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, विश्वविद्यालय प्रशासन, आयोजन समिति, संकाय सदस्यों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस राष्ट्रीय विधिक संगोष्ठी में प्राध्यापकों, शोधार्थियों, अधिवक्ताओं एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। यह संगोष्ठी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आपराधिक अन्वेषण, डिजिटल फॉरेंसिक एवं न्याय प्रशासन से जुड़े समकालीन विषयों पर सार्थक विमर्श का प्रभावी मंच सिद्ध हुई। संगोष्ठी के माध्यम से प्रतिभागियों को विधि एवं प्रौद्योगिकी के तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्र की नवीनतम प्रवृत्तियों की जानकारी प्राप्त हुई तथा भविष्य के अनुसंधान एवं शैक्षणिक संवाद को नई दिशा मिली।
