Discussion over Tea.
पत्रकार दीपक तिवारी
किसान खेत में खड़ा होकर आसमान की ओर देख रहा है, आंखों में आंसू हैं, दिल में दर्द है और हाथों में बर्बाद हुई फसल की बेबसी…
पिछले दो दिनों से आए चक्रवात और बेमौसम बारिश ने छत्तीसगढ़ के किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। जिस धान की फसल को किसान अपने खून-पसीने से सींचता है, जिस फसल के लिए वह लगभग 400 दिनों की मेहनत, लागत और उम्मीद लगाकर बैठा रहता है, आज वही फसल खेतों में बर्बादी की कहानी बयां कर रही है।
किसानों की हालत देखकर कलेजा कांप जाता है। खेतों में पानी भरा है, धान की फसल गिर चुकी है और कई जगह कटाई के इंतजार में खड़ी फसल बर्बाद हो रही है। किसानों की आंखों में आंसू डबडबा रहे हैं, लेकिन जुबां से दर्द बाहर नहीं निकल पा रहा। आखिर रोएं भी तो किसके सामने कर्ज लेकर खेती की, परिवार की जरूरतें पीछे रखीं, दिन-रात मेहनत की और अब हाथ में बची है तो सिर्फ बर्बादी!
सवाल सरकार से है… आखिर किसान हर बार प्रकृति की मार और व्यवस्था की बेरुखी दोनों क्यों झेले
एक तरफ बड़े-बड़े उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों को करोड़ों रुपये की सब्सिडी, रियायत और प्रोत्साहन देने की घोषणाएं होती हैं। दूसरी तरफ किसान अपने हक के पैसे के लिए दफ्तरों के चक्कर काटता रहता है। किसानों के लगभग 1700 करोड़ रुपये के बोनस भुगतान को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आखिर यह पैसा कब मिलेगा? किसान को उसके हक के लिए आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा
फसल बीमा की कहानी भी किसी से छिपी नहीं है। जब किसान की पूरी फसल बर्बाद होती है, तब मुआवजे के नाम पर कभी 2 हजार तो कभी 3 हजार रुपये थमा दिए जाते हैं। क्या इतनी रकम से किसान की लागत निकल जाएगी? क्या इससे खाद, बीज, दवाई, मजदूरी और कर्ज की भरपाई हो जाएगी किसान को लॉलीपॉप थमाने से उसका परिवार नहीं चलता साहब!
उद्योगपतियों के लिए करोड़ों की राहत और अन्नदाता के लिए हजार-दो हजार का मुआवजा… आखिर यह कैसा आर्थिक न्याय है
सरकारें किसानों के नाम पर योजनाएं बनाती हैं, मंचों से बड़ी-बड़ी घोषणाएं होती हैं, किसान सम्मान की बातें होती हैं, लेकिन जब किसान पर संकट आता है तो वही किसान मुआवजे, सर्वे और भुगतान की फाइलों में उलझकर रह जाता है।
अब जरूरत भाषणों की नहीं, जमीन पर कार्रवाई की है।
सरकार को चाहिए कि तत्काल प्रभावित खेतों का निष्पक्ष सर्वे कराया जाए, राजस्व और कृषि विभाग की टीमें गांव-गांव पहुंचें, फसल नुकसान का वास्तविक आकलन हो और किसानों को उचित मुआवजा दिया जाए। फसल बीमा की राशि का पारदर्शी भुगतान हो तथा लंबित बोनस का मामला भी जल्द सुलझाया जाए।
याद रखिए, किसान सिर्फ धान नहीं उगाता, वह पूरे प्रदेश की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की थाली भरता है।
आखिर में एक सवाल…
जब उद्योगपतियों को संकट से उबारने के लिए सरकार के पास करोड़ों रुपये के पैकेज होते हैं, तो देश के अन्नदाता के खेतों में बर्बाद हुई फसल के लिए सरकार का खजाना खाली क्यों नजर आता है
किसान को भाषण नहीं, उसका हक चाहिए। आश्वासन नहीं, आर्थिक सहायता चाहिए। सर्वे के नाम पर खानापूर्ति नहीं, वास्तविक नुकसान का मुआवजा चाहिए।
क्योंकि किसान बचा रहेगा, तभी खेत बचेंगे, अनाज बचेगा और देश की थाली भरी रहेगी।
चाय की चुस्की के साथ आज की सबसे कड़वी चर्चा यही है कि किसान के आंसू पोछने के लिए आखिर सरकार कब जागेगी
