UP में BJP के 25 सांसदों के क्षेत्र में पार्टी की हार मोदी के लिए बहुत बड़ी चेतावनी है

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बात निकाय चुनाव में पार्टी हित से इत्तर काम करने की कि जाए तो ऐसे सांसदों की लम्बी चौड़ी लिस्ट है जो अपने करीबी बागी प्रत्याशी को मैदान से हटाने में नाकाम रहे और इसके साथ-साथ इन्होंने पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार में भी दिलचस्पी नहीं दिखाई थी।

उत्तर प्रदेश नगर निकाय चुनाव में मिली जीत से भारतीय जनता पार्टी और योगी सरकार भले गद्गद नजर आ रही हो लेकिन अंदरखाने कुछ और ही चल रहा है। यूपी में भाजपा और सरकार के लोगों ने ऐसा माहौल बना दिया है जिससे लगता है कि विपक्ष इन चुनावों में चारों खाने चित हो चुका है लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। भले ही नगर निकाय चुनाव में सभी 17 नगर निगमों पर बीजेपी का कब्जा हो गया हो, परंतु नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों के नतीजे बता रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की राह आसान नहीं है। प्रदेश में दो दर्जन से अधिक केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा सांसदों के निर्वाचन क्षेत्र में निकाय चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। गौरतलब है कि भाजपा ने निकाय चुनाव को लोकसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास मानते हुए चुनाव लड़ा था। चुनाव जिताने की जिम्मेदारी सांसदों और विधायकों को सौंपी गई थी। बीजेपी ने 17 नगर निगम, कुछ जिला मुख्यालयों सहित कुल 91 नगर पालिका परिषद व 191 नगर पंचायतें जीती थीं तो इसके विपरीत 108 नगर पालिका परिषद और 353 नगर पंचायतों में भाजपा को हार का सामना भी करना पड़ा। निकाय चुनाव के जिलावार आंकड़े बता रहे हैं कि भाजपा के कई नामी, दिग्गज सांसद और विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशी को जीत नहीं दिला सके हैं। चुनाव परिणाम के बाद पार्टी आलाकमान को जो फीडबैक मिल रहा है उससे यह साफ है कि कई जगह सांसदों के करीबियों ने बगावत कर पार्टी प्रत्याशी को चुनाव हराया था। इसी तरह से कई जगह तो सांसदों के करीबी ही बगावत कर मैदान में आ गए थे और सांसदों ने प्रत्याशी की जगह अपने करीबी को जिताने के लिए सियासी गोटियां बिछाने का काम किया था। साल भर के भीतर होने वाले 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी प्रतिष्ठा दांव पर लगी रहेगी। ऐसे में आलाकमान उन सांसदों के टिकट पर कैंची चला सकता है जिन्होंने निकाय चुनाव में पार्टी के प्रति वफादारी नहीं दिखाई या फिर पिछले पांच वर्षों में जिनके कामों से क्षेत्र की जनता नाराज चल रही है। इसके अलावा राजेन्द्र अग्रवाल जैसे कुछ उम्र दराज सांसदों को भी अबकी से टिकट नहीं मिले तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।बहरहाल, बात निकाय चुनाव में पार्टी हित से इत्तर काम करने की कि जाए तो ऐसे सांसदों की लम्बी चौड़ी लिस्ट है जो अपने करीबी बागी प्रत्याशी को मैदान से हटाने में नाकाम रहे और इसके साथ-साथ इन्होंने पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार में भी दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। दरअसल, निकाय चुनाव भले ही स्थानीय राजनीतिक और मुद्दों पर लड़ा जाता है लेकिन परिणाम का असर आगे तक रहता है। अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए भी इसी आधार पर नेताओं की सियासी ताकत का अंदाजा लगाया गया है। बीजेपी के करीब एक दर्जन ऐसे सांसद हैं जिनकी नगर चुनाव में भूमिका को लेकर उनकी विश्वसनीयता पर उंगली उठाई जा रही है। भाजपा आलाकमान को लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरने से पूर्व इन सांसदों पर ध्यान देना होगा।बात उन नेताओं की कि जाए जिन्होंने निकाय चुनाव में पार्टी के हितों की अनदेखी करके बागी उम्मीदवारों को मैदान में उतारा तो उसमें मेरठ के सांसद राजेन्द्र अग्रवाल, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, पंकज चौधरी, संजीव वालियान और आजमगढ़ के सांसद निरहुआ शामिल हैं। हालत यह है कि केन्द्रीय मंत्री पंकज चौधरी के निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े महराजगंज जिले की आठ में तीन नगर पंचायतें भाजपा ने जीती हैं। जबकि दोनों नगर पालिका परिषद में भाजपा हारी है। केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के मुजफ्फरनगर जिले की आठ नगर पंचायतों में से एक भी भाजपा नहीं जीती है। दो नगर पालिका में से केवल एक मुजफ्फरनगर नगरपालिका जीती है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के संसदीय क्षेत्र अमेठी की एक नगर पालिका परिषद भाजपा हारी है वहीं नौ में से पांच नगर पंचायतें भाजपा ने जीती हैं। सांसद दिनेश लाल उर्फ निरहुआ के संसदीय क्षेत्र से जुड़े आजमगढ़ जिले की सभी तीन नगर पालिका में भाजपा की हार हुई है। हापुड़ में भी मेरठ के सांसद राजेंद्र अग्रवाल के क्षेत्र की हापुड़ सदर नगर पालिका सीट बसपा ने जीत ली। उधर, भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन का हिस्सा निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के सांसद पुत्र प्रवीण निषाद के क्षेत्र की नगर पालिका परिषद खलीलाबाद और नगर पंचायत मगहर में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह के निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े एटा जिले की छह में से मात्र एक अवागढ़ नगर पंचायत भाजपा ने जीती है। हालांकि चार नगर पालिका में से एटा और अलीगंज में भाजपा जीती है। सांसद सत्यपाल सिंह के निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े बागपत जिले की सभी छह नगर पंचायतें भाजपा हारी है। तीन नगर पालिका परिषद में से केवल एकमात्र खेकड़ा नगर पालिका में भाजपा जीती है। तेजतर्रार सांसद साक्षी महाराज के निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े उन्नाव जिले में 16 में से केवल तीन नगर पंचायत, तीन नगर पालिका परिषद में से केवल एक उन्नाव नगर पालिका परिषद भाजपा जीती है। इटावा के सांसद रामशंकर कठेरिया के निर्वाचन क्षेत्र के जिले इटावा में तीन नगर पालिका परिषद और तीन नगर पंचायतों में एक भी जगह जीत नहीं मिली है। भाजपा सांसद मुकेश राजपूत के क्षेत्र के जिले फर्रुखाबाद में सात में दो नगर पंचायत भाजपा ने जीती हैं। जबकि दोनों नगर पालिका परिषद में भाजपा की हार हुई है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने बीजेपी की हार पर कहा कि उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में भाजपा के लगभग 25 सांसदों के क्षेत्र में जनता ने भाजपा के प्रत्याशियों को हराया है। ये महंगाई, बेरोज़गारी, ठप्प कारोबार, ध्वस्त क़ानून-व्यवस्था, नारी-युवा विरोधी भाजपाई सोच व भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जनता का फ़ैसला है।

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