BHUPESH-VIJAY DEBATE : Bhupesh and Vijay clash at PM’s residence, poor entangled in statistics!
रायपुर। गरीब के लिए अपना घर सबसे बड़ा सपना है, लेकिन छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री आवास योजना का यही सपना अब आंकड़ों की सियासत में उलझता नजर आ रहा है।
रायपुर प्रेस क्लब में उपमुख्यमंत्री एवं पंचायत-ग्रामीण विकास मंत्री विजय शर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आमने-सामने बैठे। करीब डेढ़ घंटे तक दोनों के बीच PM आवास के आंकड़ों और उपलब्धियों को लेकर खुली बहस हुई।
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दोनों नेता पूरी तैयारी के साथ प्रेस क्लब पहुंचे थे। फाइलें, आंकड़े, प्रेस नोट और बैनर लेकर दोनों ने अपनी-अपनी सरकार के कामकाज का हिसाब सामने रखा। विजय शर्मा ने मौजूदा सरकार की उपलब्धियां गिनाईं, तो भूपेश बघेल ने पिछली सरकार से लेकर वर्तमान सरकार तक PM आवास से जुड़े आंकड़ों और परिस्थितियों पर अपनी बात रखी।
इस बहस की खास बात यह रही कि छत्तीसगढ़ में पहली बार दो बड़े राजनीतिक नेताओं के बीच इस तरह की खुली बहस देखने को मिली। दोनों एक-दूसरे के आंकड़ों को चुनौती देते नजर आए। अब बहस के वीडियो और दोनों नेताओं के दावे सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बने हुए हैं।
PM आवास को लेकर दावे करीब 11 लाख से 24 लाख तक के आंकड़ों के बीच घूम रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि आखिर कितने गरीब परिवारों को वास्तव में मकान मिला और कितने परिवार अब भी अपने घर का इंतजार कर रहे हैं।
विजय शर्मा ने आंकड़ों के जरिए मौजूदा सरकार के काम को सामने रखा, वहीं भूपेश बघेल ने अपनी सरकार के समय की परिस्थितियों, कोरोना काल और आवास निर्माण से जुड़े मुद्दों को उठाया। दिलचस्प बात यह रही कि गणित के छात्र रहे भूपेश बघेल और गणित के शिक्षक रह चुके विजय शर्मा, दोनों ही इस बहस में आंकड़ों का पूरा हिसाब लेकर पहुंचे थे।
PM आवास पहले भी छत्तीसगढ़ की राजनीति का बड़ा मुद्दा रहा है। विधानसभा चुनाव के दौरान भी गरीबों के मकान और आवास के वादे चुनावी चर्चा के केंद्र में रहे। अब भाजपा जहां बने हुए आवासों तक पहुंचकर अपनी उपलब्धि बताने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस मौजूदा सरकार को इन्हीं आंकड़ों के आधार पर घेरने की तैयारी में है।
बहस के दौरान विजय शर्मा कई बार भूपेश बघेल पर राजनीतिक चुटकी लेते भी नजर आए। वहीं, बघेल ने चर्चा को रमन सिंह सरकार से लेकर वर्तमान सरकार तक PM आवास के आंकड़ों और परिस्थितियों पर केंद्रित रखा।
अब इस बहस के बाद असली सवाल राजनीतिक दावों से आगे का है, कागजों में कितने आवास और जमीन पर कितने मकान? दोनों नेताओं के आंकड़ों का स्वतंत्र विश्लेषण ही इस सवाल की तस्वीर साफ कर सकता है।
