CHHATTISGARH : अफसरों की कमी से जूझ रहा छत्तीसगढ़

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CHHATTISGARH : Chhattisgarh is grappling with shortage of officers

रायपुर। छत्तीसगढ़ में इन दिनों प्रशासनिक ढांचा दबाव में है। आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों की कमी ने शासन-प्रशासन की रफ्तार पर असर डालना शुरू कर दिया है। हालात ऐसे हैं कि कई वरिष्ठ अधिकारियों को एक साथ कई अहम विभागों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है।

IAS में 29 पद खाली

प्रदेश में आईएएस के कुल 202 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में सिर्फ 173 अफसर तैनात हैं। यानी 29 पद खाली हैं। शीर्ष स्तर पर भी स्थिति पूरी तरह संतुलित नहीं है। पांच चीफ सेक्रेटरी स्तर के अफसरों में से चार एडिशनल चीफ सेक्रेटरी हैं, जिनमें दो की पोस्टिंग मंत्रालय से बाहर है।

केंद्र प्रतिनियुक्ति से बढ़ी कमी

अधिकारियों की कमी का बड़ा कारण केंद्रीय प्रतिनियुक्ति है। फिलहाल 21 आईएएस अफसर केंद्र सरकार में कार्यरत हैं। इनमें अमित अग्रवाल और निधि छिब्बर जैसे वरिष्ठ नाम शामिल हैं। हाल में एस हरीश और डॉ. प्रियंका शुक्ला भी दिल्ली चले गए हैं। ये अधिकारी केंद्र में नीति निर्माण, डिजिटल पहचान, स्वास्थ्य और निवेश जैसे अहम क्षेत्रों में जिम्मेदारी निभा रहे हैं। लेकिन राज्य में उनकी अनुपस्थिति प्रशासनिक दबाव बढ़ा रही है।

IPS और IFS में भी हाल गंभीर

सिर्फ प्रशासनिक सेवा ही नहीं, पुलिस और वन विभाग भी कमी से जूझ रहे हैं।

आईपीएस के 153 स्वीकृत पदों में से 134 ही भरे हैं, यानी 19 पद खाली हैं।

आईएफएस में स्थिति और गंभीर है 153 पदों में से सिर्फ 118 तैनात हैं। 35 पद रिक्त हैं।

चुनावी जिम्मेदारी से बढ़ेगा दबाव

आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर छत्तीसगढ़ के 25 आईएएस और 5 आईपीएस अफसरों को चुनाव पर्यवेक्षक बनाया गया है। अगले महीने बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुदुचेरी में चुनाव अधिसूचना जारी हो सकती है। इसके बाद कई वरिष्ठ अफसर राज्य से बाहर चुनाव ड्यूटी पर रहेंगे, जिससे प्रशासनिक कामकाज पर और असर पड़ सकता है।

प्रतिनियुक्ति का गणित

केंद्रीय प्रतिनियुक्ति आमतौर पर 5 साल के लिए होती है, जिसे विशेष परिस्थितियों में 7 साल तक बढ़ाया जा सकता है। डिप्टी सेक्रेटरी या डायरेक्टर स्तर पर यह अवधि 4-5 साल की होती है। इससे अफसरों को केंद्र में अनुभव मिलता है, जो भविष्य में पदोन्नति में सहायक होता है, लेकिन राज्य में पद रिक्त रह जाते हैं।

फिलहाल सवाल यही है कि क्या आने वाले समय में इन खाली पदों को भरने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे या प्रशासनिक दबाव यूं ही बना रहेगा।

 

 

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