TRUMP HIB VISA FEE : Trump administration lists 9 reasons for increasing visa fees…
वॉशिंगटन। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एच-1बी वीज़ा प्रोग्राम में बड़ा बदलाव करते हुए नए आवेदनों पर 100,000 डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) की भारी-भरकम फीस लगाने का ऐलान किया है। व्हाइट हाउस ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम प्रोग्राम के दुरुपयोग, अमेरिकी नौकरियों के नुकसान और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए उठाया गया है।
क्यों बढ़ाई गई H-1B फीस?
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि कई कंपनियां H-1B वीज़ा का जानबूझकर दुरुपयोग करती रही हैं। उनका तर्क है कि अमेरिकी कंपनियां कम सैलरी वाले विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर अमेरिकी वर्कफोर्स को नुकसान पहुंचा रही हैं।
नई नीति के मुताबिक –
अमेरिका के बाहर से आने वाले सभी नए H-1B आवेदनकर्ताओं को अब 1 लाख डॉलर फीस चुकानी होगी।
मौजूदा वीज़ा धारकों या अमेरिका से बाहर रह रहे लोगों पर यह शुल्क लागू नहीं होगा।
इस फैसले का उद्देश्य केवल हाईली स्किल्ड और हाई सैलरी वाली नौकरियों को ही H-1B के तहत प्राथमिकता देना है।
फैसले के समर्थन में व्हाइट हाउस के तर्क
टेक सेक्टर पर विदेशी निर्भरता – 2003 में आईटी सेक्टर में 32% H-1B कर्मचारी थे, 2025 तक यह 65% से ज्यादा हो गया।
अमेरिकी ग्रेजुएट्स की बेरोजगारी – कंप्यूटर साइंस ग्रेजुएट्स की बेरोजगारी दर 6.1% और कंप्यूटर इंजीनियरिंग की 7.5% है।
विदेशी श्रमिकों की बढ़ती संख्या – 2000 से 2019 के बीच विदेशी STEM वर्कर्स दोगुने हुए, जबकि कुल STEM रोजगार सिर्फ 44.5% बढ़ा।
बड़ी कंपनियों में छंटनी – कई कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी करते हुए H-1B वर्कर्स की भर्ती जारी रखती हैं।
रिप्लेसमेंट ट्रेनिंग – कई बार अमेरिकी वर्कर्स को अपने H-1B रिप्लेसमेंट को ट्रेन देने के लिए मजबूर किया गया।
राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा – टेक और इंफ्रास्ट्रक्चर में विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया।
सुधारों की दिशा – श्रम विभाग प्रचलित वेतन नियम बदलेगा और गृह सुरक्षा विभाग उच्च वेतन और उच्च कौशल वाली नौकरियों को प्राथमिकता देगा।
“अमेरिका-फर्स्ट” एजेंडे पर जोर
व्हाइट हाउस ने कहा कि ट्रंप प्रशासन के लौटने के बाद से सभी रोजगार अमेरिकी श्रमिकों को दिए गए हैं। साथ ही फेडरल वर्कफोर्स प्रोग्राम में बदलाव कर अवैध अप्रवासियों को बाहर किया गया है।
बड़ा असर भारत पर
इस फैसले का सबसे ज्यादा असर भारतीय आईटी कंपनियों और प्रोफेशनल्स पर पड़ सकता है, क्योंकि अमेरिका में H-1B वीज़ा धारकों में सबसे बड़ा हिस्सा भारतीयों का है।

