SUPREME COURT : SC rebukes tribunal ‘uncontrolled’, outsourced till verdict!
नई दिल्ली, 27 फरवरी। देश के न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल) के कामकाज पर सख्त टिप्पणी करते हुए Supreme Court of India ने गुरुवार को कहा कि ये संस्थाएं बिना जवाबदेही के “बोझ और झंझट” बन गई हैं। अदालत ने यहां तक कहा कि कुछ तकनीकी सदस्य फैसले लिखने का काम “आउटसोर्स” कर रहे हैं, जो न्यायिक प्रणाली में बेहद गंभीर बात है।
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने तल्ख लहजे में कहा कि ट्रिब्यूनल सरकार की रचना हैं, लेकिन अब वे “अनियंत्रित” होकर काम कर रहे हैं। अदालत ने चिंता जताई कि न तो ये न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह हैं और न ही किसी अन्य प्राधिकरण के प्रति।
“सरकार के लिए सिरदर्द, हमारे लिए बोझ”
सुनवाई के दौरान सीजेआई ने अटॉर्नी जनरल R. Venkataramani से कहा कि ट्रिब्यूनल अब सरकार के लिए सिरदर्द और अदालतों के लिए बोझ बनते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इनके आदेशों के कारण उच्चतम न्यायालय पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है।
पीठ न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 से जुड़े पिछले फैसले के मद्देनजर अध्यक्षों और सदस्यों के कार्यकाल विस्तार की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। गौरतलब है कि नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम के नियुक्ति और कार्यकाल संबंधी प्रावधानों को रद्द कर दिया था।
“तकनीकी सदस्य खुद फैसला नहीं लिख रहे”
सीजेआई ने बेहद गंभीर आरोपों का जिक्र करते हुए कहा कि एक महत्वपूर्ण वित्तीय न्यायाधिकरण में तकनीकी सदस्य खुद फैसले नहीं लिख रहे थे। बल्कि वे न्यायिक सदस्य से अपने नाम पर फैसला लिखवाने का दबाव बना रहे थे। यहां तक कि एक मामले में हस्ताक्षर न करने की धमकी तक दी गई।
उन्होंने कहा कि कुछ जगहों पर निर्णय लिखने का काम बाहर कराया जा रहा है, जो पूरी तरह अस्वीकार्य है। “उचित समय आने पर कार्रवाई की जाएगी,” अदालत ने सख्त लहजे में कहा।
रिक्त पद भरने के निर्देश
अदालत ने केंद्र सरकार से ट्रिब्यूनल में खाली पदों को तत्काल भरने के लिए ठोस तंत्र विकसित करने को कहा। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया कि किसी तकनीकी सदस्य को अध्यक्ष का कार्यभार सौंपने की मौजूदा व्यवस्था पर उसे आपत्ति है।
पीठ ने फिलहाल अंतरिम उपाय के तौर पर ट्रिब्यूनल अध्यक्षों के कार्यकाल को अगले आदेश तक बढ़ाने का निर्देश दिया है, ताकि कार्यात्मक संकट न पैदा हो।
सुप्रीम कोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी ने ट्रिब्यूनल व्यवस्था और उसकी जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब निगाहें इस पर हैं कि सरकार क्या ठोस कदम उठाती है।

