पंजाब के बाद अब राजस्थान की बारी, क्या कांग्रेस में पुराने दिग्गजों की शुरू हो गई उल्टी गिनती?

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नई दिल्ली : नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर गांधी परिवार ने ये संदेश दे दिया है कि वे पार्टी के असली बॉस हैं. वैसे देखा जाय तो सिद्धू को लेकर गांधी परिवार ने पहले ही फैसला कर लिया था, लेकिन कैंप्टन अमरिंदर सिंह के कड़े तेवर देख कर वो नए अध्यक्ष के नाम के ऐलान से हिचक रहे थे. कैप्टन इस बात पर अड़े थे कि वो सिद्धू से तब तक नहीं मिलेंगे जब तक कि वो उनसे माफी न मांग लें. सूत्रों का कहना है कि सोनिया गांधी परेशान थीं और सोच रही थीं कि क्या उन्हें अपना फैसला स्थगित कर देना चाहिए. लेकिन जब प्रताप सिंह बाजवा ने पंजाब के सांसदों के साथ बैठक कर पार्टी नेतृत्व को आंख दिखाने की कोशिश की तो सोनिया ने कड़ा संदेश दे दिया. देर रात उन्होंने सिद्धू को आखिरकार पीसीसी प्रमुख नियुक्त करने की घोषणा कर दी.सोनिया गांधी को लगा कि अगर वो अपने फैसले से पीछे हटती हैं तो फिर पार्टी पर उनकी पकड़ कमज़ोर हो जाएगी. कैप्टन अमरिंदर सिंह हार मानने के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने पंजाब प्रभारी हरीश रावत को अपनी इच्छा ज़ाहिर पर पार्टी को संदेश दे दिया. बता दें कि सिद्धू के साथ चारों कार्यकारी अध्यक्षों का चुनाव सोच-समझकर किया गया है. इससे न केवल पार्टी को क्षेत्रीय संतुलन मिलेगी बल्कि उनमें से ज्यादातर राहुल गांधी के करीबी हैं.

अब राजस्थान की बारी
पंजाब के बाद अब हर किसी की निगाहें राजस्थान पर टिकी हैं. सवाल उठता है कि क्या गांधी परिवार यहां भी बदलाव कर प्रदेश की कमान किसी युवा नेता को देंगे. सबसे पहले बता दें कि पंजाब के घटनाक्रम पर सचिन पायलट के समर्थकों की नज़रें टिकी थीं. कहा जा रहा है कि जिन वजहों से पंजाब में अमरिंदर सिंह की बातों को नजरअंदाज कर पार्टी ने सिद्धू को कमान दी, अब यहीं मांग राजस्थान में पायलट के समर्थक भी रखेंगे. वो गांधी परिवार से पूछेंगे कि आखिर क्यों वो अशोक गहलोत से डरते हैं.

पायलट समर्थक इंतज़ार में
इस बात को करीब 6 महीने हो गए हैं, जब गांधी परिवार ने पायलट और गहलोत के बीच विवाद को सुलझाया था. उस वक्त सचिन पायलट से कहा गया था कि उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा. लेकिन अभी इस मोर्चे पर कोई फैसला नहीं लिया गया है. लिहाजा पायलट के समर्थक अब बेहद उतावले हो रहे हैं, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि पंजाब के बाद गांधी परिवार ताकतवर दिग्गज नेता गहलोत से भी मुकाबला करेंगे. गांधी परिवार एक के बाद एक चुनाव हार रहा है और इससे पार्टी पर उनकी पकड़ ढीली हो गई है. कई युवा नेताओं ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पार्टी छोड़ दी है, और कुछ दिग्गजों को लगता है कि गांधी भाई-बहनों के कार्यभार संभालने से उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है.

युवा नेताओं पर नज़र
पंजाब के फैसले से गांधी परिवार ने अपने दबदबे को रेखांकित किया है. सिद्धू को नियुक्त करने के लिए स्थानीय नेतृत्व के मतभेद को नज़रअंदाज करना एक बहुत बड़ा जुआ है, लेकिन अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या वे राजस्थान के साथ-साथ अन्य राज्यों में भी वही जोखिम दिखा सकते हैं, जहां युवा नेता अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं.

कर्नाटक में नेतृत्व को लेकर घमासान
सिर्फ पंजाब और राजस्थान ही नहीं बल्कि कर्नाटक में भी नेतृत्व को लेकर दो नेताओं के बीच जंग छिड़ी है. चुनाव से पहले डीके शिवकुमार और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया आमने-सामने हैं. शिवकुमार को राहुल गांधी का समर्थन प्राप्त है, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उन्हें पीसीसी प्रमुख के रूप में नियुक्ति के बाद नए नेता के रूप में पेश किया जाएगा.

बदलाव की लहर
अब ये साफ हो गया है कि राहुल और प्रियंका गांधी की पार्टी पर पकड़ मजबूत होती जा रही है. वे दोनों सारे बड़े फैसले ले रहे हैं. वे चाहते हैं कि युवा नेता पार्टी की कमान संभालें. पंजाब अब इसके लिए प्रयोग का मैदान बन गया है. उन्होंने ये साफ कर दिया है कि अगर कांग्रेस को साल 2022 के चुनाव में जीत हासिल करनी हो तो फिर उन्हें कैप्टन अमरिंदर सिंह के अलावा किसी और के नाम पर विचार करना होगा.

क्या होगा दिग्गजों का?
पंजाब अन्य राज्यों के लिए भी संकेत हो सकता है. तो क्या कर्नाटक में सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार लेंगे? हरियाणा में भूपेंद्र हुड्डा पर रणदीप सुरजेवाला या कुमारी शैलजा भारी पड़ेंगी? क्या युवा चेहरों की तलाश शुरू गई है. भले ही पंजाब में अभी शुरुआत हुई हो, लेकिन अब सभी की निगाहें राजस्थान पर टिकी हैं, जो गांधी परिवार की पकड़ को और मजबूत कर सकता है.

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