KULPATI LEKHAK VIVAD : Unity breaks down over writer’s insult, literary controversy gets embroiled in politics – Dr. Shukla
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी बिलासपुर में हालिया कुलपति–लेखक विवाद अब धीरे-धीरे राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। सोशल मीडिया पर चल रही मुहिम में कुछ लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता इस पूरे मामले को वैचारिक खांचे में फिट करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे असली मुद्दा पीछे छूटता नजर आ रहा है।
डॉ. संजय शुक्ला ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक साहित्यिक आयोजन में कुलपति द्वारा आमंत्रित लेखक और कथाकार के साथ किया गया व्यवहार निंदनीय है, लेकिन इस घटना को दक्षिणपंथ-वामपंथ और संघ-भाजपा से जोड़ना और भी दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने लिखा कि इससे पहले भी प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल को रायपुर में एक साहित्यिक आयोजन के दौरान मंच साझा करने को लेकर विवाद में घसीटा गया था, जब वे पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के साथ मंच पर मौजूद थे। उस समय भी कुछ गैर-भाजपाई खेमों ने इस पर आपत्ति जताई थी।
डॉ. शुक्ला के अनुसार, 7 जनवरी को बिलासपुर में हुई घटना ने उस शहर की साहित्यिक परंपरा और आतिथ्य संस्कार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह वही शहर है जिसने पं. द्वारिकाप्रसाद तिवारी ‘विप्र’, श्रीकांत वर्मा और पं. श्यामलाल चतुर्वेदी जैसे साहित्यकार दिए हैं।
पोस्ट में कहा गया है कि सोशल मीडिया पर पहले जहां सर्वसम्मति से कुलपति के व्यवहार की आलोचना हो रही थी, वहीं जैसे ही कुछ लोगों ने इसे आरएसएस और भाजपा से जोड़ना शुरू किया, पूरा मुद्दा दो ध्रुवों में बंट गया। एक ओर कुलपति की कथित वैचारिक पृष्ठभूमि खंगाली जा रही है, तो दूसरी ओर लेखक मनोज रूपड़ा को वामपंथी बताकर उनकी लेखनी पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
डॉ. संजय शुक्ला का साफ कहना है कि यह विवाद किसी विचारधारा का नहीं बल्कि संस्कारहीनता और अहंकारी प्रवृत्ति का परिणाम है। अगर कुलपति को लेखक से वैचारिक आपत्ति होती तो उन्हें आमंत्रित ही नहीं किया जाता। ऐसे में पूरे मामले को राजनीतिक रंग देना पूर्वाग्रह से ज्यादा कुछ नहीं है।
उन्होंने लिखा कि इस तरह के राजनीतिकरण से न केवल लेखक समुदाय को नुकसान हो रहा है, बल्कि असल सवाल लेखक के अपमान पर से ध्यान भी भटक रहा है।

