बिलासपुर, 14 जून 2025: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि बच्चा गोद लेने वाली महिला कर्मचारी भी मातृत्व अवकाश (Child Care Leave) की हकदार हैं। यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक मां के मौलिक अधिकार को रेखांकित करता है, जिसमें नवजात शिशु को मातृत्वपूर्ण देखभाल और स्नेह प्रदान करने का अधिकार शामिल है, चाहे मातृत्व जैविक हो, गोद लिया हुआ हो, या सरोगेसी के माध्यम से प्राप्त हुआ हो।
मामले का विवरण
यह मामला रायपुर के भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) में सहायक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में कार्यरत एक महिला कर्मचारी से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने 20 नवंबर 2023 को अपने पति के साथ एक नवजात बच्ची को गोद लिया और उसी दिन से 180 दिन की चाइल्ड एडॉप्शन लीव के लिए आवेदन किया। हालांकि, IIM ने अपनी HR नीति में चाइल्ड एडॉप्शन लीव का प्रावधान न होने का हवाला देते हुए उनके आवेदन को अस्वीकार कर दिया और केवल 60 दिन का अवकाश स्वीकृत किया।
इसके बाद, याचिकाकर्ता ने राज्य महिला आयोग से संपर्क किया, जिसने 180 दिन की गोद लेने की छुट्टी और 60 दिन की कम्यूटेड लीव की सिफारिश की। IIM ने आयोग के इस निर्देश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया।
कोर्ट का निर्णय
जस्टिस विभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि मातृत्व अवकाश और चाइल्ड एडॉप्शन लीव केवल एक लाभ नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जैविक, गोद लेने वाली, या सरोगेट माताओं के बीच मातृत्व लाभों में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी संस्थान की HR नीति में चाइल्ड एडॉप्शन लीव का प्रावधान नहीं है, तो भारत सरकार के केंद्रीय सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1972 के नियम 43-B(1) का पालन किया जाना चाहिए। इस नियम के अनुसार, दो से कम जीवित बच्चों वाली महिला सरकारी कर्मचारी, जो एक वर्ष से कम आयु के बच्चे को गोद लेती है, 180 दिन की चाइल्ड एडॉप्शन लीव की हकदार है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 180 दिन की छुट्टी प्रदान करने का आदेश दिया, जिसमें से 84 दिन पहले ही मातृत्व लाभ अधिनियम, 2017 के तहत मिल चुके थे। शेष अवकाश को समायोजित करने के निर्देश दिए गए।
फैसले का महत्व
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 38, 39, 42, और 43 का उल्लेख करते हुए कहा कि गोद लेने वाली माताएं भी जैविक माताओं की तरह अपने बच्चों के प्रति समान स्नेह और जिम्मेदारी रखती हैं। कोर्ट ने जोर दिया कि मातृत्व अवकाश महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी को बढ़ावा देने और उनके संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(g), और 21) को संरक्षित करने के लिए आवश्यक है।
कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि यदि चाइल्ड केयर लीव का प्रावधान नहीं किया गया, तो महिलाएं कार्यबल छोड़ने के लिए मजबूर हो सकती हैं, जो उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। यह फैसला न केवल गोद लेने वाली माताओं के लिए, बल्कि सभी कामकाजी महिलाओं के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
समाज और नीति पर प्रभाव
यह फैसला गोद लेने वाली माताओं के लिए मातृत्व अवकाश के अधिकार को मजबूत करता है और कार्यस्थल पर लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है। यह नियोक्ताओं को अपनी HR नीतियों को संवैधानिक और कानूनी मानदंडों के अनुरूप बनाने के लिए प्रेरित करेगा। साथ ही, यह फैसला उन महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा, जो गोद लेने के माध्यम से मातृत्व का सुख प्राप्त करना चाहती हैं।
इस फैसले को सामाजिक और कानूनी हलकों में व्यापक सराहना मिल रही है, क्योंकि यह मातृत्व के विभिन्न रूपों को समान सम्मान और अधिकार प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
