Discussion over tea – Assault in Kawardha, or an attempt to disrupt social harmony?
पत्रकार दीपक तिवारी
मिर्च-मसाला के साथ कुछ तीखे सवाल, जिनके जवाब शहर जानना चाहता है!
चाय पर चर्चा का मुद्दा आज पूरे कवर्धा शहर में गर्म है। चर्चा सरोदा बांध की ओर जा रहे चार डॉक्टरों की कार और एक पिकअप वाहन के बीच हुई टक्कर से शुरू हुई, लेकिन देखते ही देखते मामला मारपीट और फिर सामाजिक रंग लेने की चर्चाओं तक पहुंच गया।
बताया जा रहा है कि कार और पिकअप की टक्कर के बाद कार सवार चार डॉक्टरों की पिकअप चालक से कहासुनी हुई और मारपीट की नौबत आ गई। इसके बाद पिकअप चालक ने अपने मालिक को फोन कर घटना की जानकारी दी। कुछ समय बाद पिकअप मालिक के साथ करीब 20 लोग मौके पर पहुंच गए।
दूसरी तरफ कार में सवार डॉक्टरों ने हिंदू के नेताओं को फोन कर यह जानकारी दी कि उन्हें मुस्लिम समुदाय के लोगों ने घेर लिया है। इसके बाद हिंदू के नेता भी मौके पर पहुंचे और फिर विवाद ने एक नया रूप ले लिया। आरोप है कि इस दौरान दोनों पक्षों के बीच दोबारा मारपीट हुई। बाद में पुलिस मौके पर पहुंची और सभी संबंधित लोगों को थाने ले गई।
अब सवाल यह है कि आखिर एक सड़क दुर्घटना और आपसी मारपीट के मामले को हिंदू-मुस्लिम विवाद बनाने की जरूरत क्यों पड़ी
अगर दो गाड़ियों में टक्कर हुई, तो उसकी जिम्मेदारी और गलती की जांच पुलिस करे। अगर किसी ने मारपीट की है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन किसी भी पक्ष को भीड़ इकट्ठा करके कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार किसने दिया
सबसे गंभीर सवाल उन पढ़े-लिखे लोगों से है, जिनसे समाज जिम्मेदारी और समझदारी की उम्मीद करता है। डॉक्टर समाज का एक सम्मानित वर्ग है। अगर घटना में डॉक्टरों की भूमिका को लेकर लगाए जा रहे आरोप सही हैं, तो यह भी जांच का विषय है कि आखिर शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा का उपयोग विवाद सुलझाने के बजाय उसे बढ़ाने में क्यों हुआ
चर्चा यह भी है कि विवाद के बाद एक पक्ष की ओर से माफी मांगने की बात सामने आई, लेकिन साथ ही अपनी गलती न होने का दावा भी किया गया। आखिर सच क्या है, यह पुलिस की निष्पक्ष जांच से ही सामने आना चाहिए।
अब जरा 2021 के झंडा कांड को भी याद कीजिए!
कवर्धा ने पहले भी एक स्थानीय विवाद को सामाजिक और सांप्रदायिक रंग लेते देखा है। उस समय भी दो व्यक्तियों के बीच शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे हिंदू-मुस्लिम मुद्दा बन गया था। उस घटना के बाद पूरे जिले में बंद और तनाव की स्थिति बनी थी। उस विवाद में भी दो सामान्य परिवारों से जुड़े लोगों के बीच की घटना ने बड़े सामाजिक विवाद का रूप ले लिया था।
इतिहास से सबक लेने के बजाय क्या हम फिर उसी रास्ते पर चलने की तैयारी कर रहे हैं
चाय पर चर्चा का सीधा सवाल है:
सड़क दुर्घटना हुई तो पुलिस जांच करे, इसमें धर्म कहां से आ गया
मारपीट हुई तो दोषियों पर कार्रवाई हो, इसमें संगठन और भीड़ की जरूरत क्यों पड़ी
क्या हर व्यक्तिगत विवाद को हिंदू-मुस्लिम रंग देना जरूरी हो गया है
क्या कवर्धा को फिर किसी बड़े सामाजिक तनाव की ओर धकेलने की कोशिश हो रही है
पढ़े-लिखे और जिम्मेदार लोगों से समाज को संयम की उम्मीद नहीं करनी चाहिए
याद रखिए, किसी एक व्यक्ति की गलती पूरे समाज की गलती नहीं होती। न हिंदू समाज को किसी के व्यक्तिगत कृत्य के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है और न मुस्लिम समाज को।
कवर्धा को न हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई चाहिए, न संगठनों की ताकत का प्रदर्शन। कवर्धा को चाहिए कानून का राज, निष्पक्ष जांच और सामाजिक भाईचारा।
आखिर में बस इतना ही…
☕ चाय ठंडी हो सकती है, लेकिन कवर्धा का माहौल गर्म नहीं होना चाहिए!
क्योंकि शहर को आग लगाने वाले बहुत मिल जाते हैं, लेकिन उस आग को बुझाने वाले बहुत कम होते हैं।
चाय पर चर्चा – सवाल तीखे होंगे, लेकिन मकसद समाज को जोड़ना होगा, तोड़ना नहीं!


