Bravery wrapped in a blanket of snow : Returning from Siachen, I saw with my own eyes, where even the breath salutes, and understood the nation.
दुनिया के सबसे ऊँचे युद्धक्षेत्र सियाचिन के बेस कैंप तक पहुँचना किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं। रायपुर के पत्रकारों के दल के साथ वहाँ बिताए कुछ घंटे ज़िंदगी भर की पूँजी बन गए, जहाँ हर साँस में देशभक्ति घुली है और हर चट्टान पर बलिदान की इबारत लिखी है।
नुब्रा घाटी की सर्पीली सड़कों से गुज़रते हुए जब सियाचिन बेस कैंप का बोर्ड दिखा, तो गाड़ी में अचानक ख़ामोशी छा गई। शायद हम सब एक ही बात सोच रहे थे, यह वही धरती है, जहाँ तापमान शून्य से पचास डिग्री नीचे चला जाता है और फिर भी हमारा जवान सीना ताने खड़ा रहता है।
बेस कैंप पहुँचते ही कैंप इंचार्ज ने हमारा स्वागत गर्म चाय और उससे भी गर्म मुस्कान से किया। उन्होंने ग्लेशियर डिप्लॉयमेंट की बारीकियाँ समझाईं, कैसे जवान महीनों की कठिन ट्रेनिंग के बाद अठारह से बीस हज़ार फीट की ऊँचाई पर तैनात होते हैं, कैसे ऑक्सीजन की कमी, बर्फ़ीले तूफ़ान और हिमदरारें हर क़दम पर मौत बनकर खड़ी रहती हैं। वे बता रहे थे और हम सुन नहीं, महसूस कर रहे थे। एक पत्रकार साथी ने धीरे से कहा “हम ख़बरें लिखते हैं, ये लोग इतिहास लिखते हैं।”
फिर हम पहुँचे ओपी बाबा के मंदिर। सियाचिन के हर सैनिक की आस्था के केंद्र इस मंदिर की मान्यता है कि ग्लेशियर पर जाने से पहले हर जवान यहाँ ‘रिपोर्ट’ करता है और लौटकर हाज़िरी देता है। कहते हैं, ओपी बाबा हर तैनात सैनिक की रक्षा करते हैं। घंटी की गूँज, धूप की महक और बर्फ़ीली हवा उस क्षण लगा कि आस्था और शौर्य यहाँ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हमने भी सिर झुकाया जवानों की सलामती के लिए, देश की सलामती के लिए।
लेकिन जिस पल ने हम सबकी आँखें नम कर दीं, वह था वॉर मेमोरियल। शहीदों के नामों से भरी काले पत्थर की दीवारों के सामने खड़े होकर एहसास हुआ कि आज़ादी की क़ीमत क्या होती है। वहाँ तैनात एक युवा अग्निवीर ने जब वीरता की गाथाएँ सुनानी शुरू कीं, तो समय जैसे ठहर गया। उसकी आवाज़ में कंपन था, पर आँखों में गर्व की चमक। उसने बताया कि कैसे साथियों ने बर्फ़ के तूफ़ान में एक-दूसरे के लिए जान की बाज़ी लगाई, कैसे कोई माँ का इकलौता बेटा तिरंगे में लिपटकर लौटा। सुनाते-सुनाते वह एक पल रुका, गहरी साँस ली और बोला “ये सिर्फ़ नाम नहीं हैं साहब, ये हमारे परिवार हैं।” उस बीस-बाईस साल के जवान की परिपक्वता देखकर लगा कि देश सुरक्षित हाथों में है।
लौटते वक़्त पीछे मुड़कर देखा बर्फ़ से ढकी चोटियाँ सूरज की रोशनी में चमक रही थीं। मन में एक ही विचार था कि हम अपने घरों में चैन की नींद इसलिए सोते हैं, क्योंकि कोई माइनस पचास डिग्री में जागता है। सियाचिन सिर्फ़ एक ग्लेशियर नहीं, हमारे राष्ट्र के संकल्प का जीवंत स्मारक है।
रायपुर लौट आए हैं, पर मन अब भी वहीं है ओपी बाबा की घंटियों में, मेमोरियल की ख़ामोशी में और उस अग्निवीर की भीगी आवाज़ में। सलाम सियाचिन, सलाम भारत के वीरों को।
