कवर्धा। स्वच्छता के नाम पर राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार पाने वाला कवर्धा शहर आज जमीनी हकीकत में अपनी बदहाली पर खुद शर्मिंदा नजर आता है। पुरस्कारों की चमक और फोटोग्राफी के बीच शहर की जनता आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। स्मार्ट सिटी के दायरे में आने का ढिंढोरा पीटा गया, लेकिन शहर में एक भी सार्वजनिक मूत्रालय ढूंढना किसी चुनौती से कम नहीं है। शहर के प्रमुख चौक-चौराहों, बाजारों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में न तो सार्वजनिक शौचालय हैं और न ही मूत्रालय। मजबूरी में नागरिक खुले में जाने को विवश हैं, जो स्वच्छता अभियान और नगर पालिका के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।
कचरे के ढेर, बदहाल सफाई व्यवस्था
शहर के कई वार्डों में जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हुए हैं। नालियां जाम हैं, नियमित सफाई का कोई ठोस सिस्टम नजर नहीं आता। बरसात के दिनों में स्थिति और भी भयावह हो जाती है। सवाल यह है कि जब शहर की सफाई व्यवस्था इतनी कमजोर है तो फिर स्वच्छता का पुरस्कार किस आधार पर मिला?
नगर पालिका को जनता से ज्यादा फोटो की चिंता
नगर पालिका के जिम्मेदार पदाधिकारी जनता की समस्याओं को सुनने और समाधान करने के बजाय क्रिकेट टूर्नामेंट, कार्यक्रमों और फोटो सेशन में व्यस्त नजर आते हैं। आयोजन पर खर्च, बैनर-पोस्टर और प्रचार तो होता है, लेकिन मूत्रालय, पेयजल, सफाई जैसी बुनियादी जरूरतें फाइलों में ही दबी रह जाती हैं।
VIP मूवमेंट के बावजूद सुविधाओं का अभाव
जिले में अक्सर वीआईपी मूवमेंट होता रहता है। इसके बावजूद शहर में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा सकीं। इससे साफ है कि नगर पालिका की प्राथमिकताओं में जनता कहीं नजर नहीं आती।
सवालों के घेरे में नगर पालिका
पूरे शहर का दौरा कर लीजिए, एक भी ढंग का सार्वजनिक मूत्रालय नहीं मिलेगा। क्या यही स्मार्ट सिटी है? क्या यही राष्ट्रीय पुरस्कार की असली तस्वीर है? अब शहरवासी यह सवाल पूछ रहे हैं कि नगर पालिका सिर्फ कागजी स्वच्छता दिखाएगी या वास्तव में जनता के दुख-दर्द को
समझकर जमीनी स्तर पर काम भी करेगी?
अगर जल्द ही हालात नहीं सुधरे, तो स्वच्छता के ये तमगे सिर्फ दिखावा बनकर रह जाएंगे और जनत
पत्रकार दीपक तिवारी दैनिक छत्तीसगढ़ wach जिला ब्यूरो कवर्धा कबीरधाम

