PANDARIYA MLA CONTROVERSY : MLA’s rebuke at the police station, does the law allow it?
पत्रकार दीपक तिवारी
पंडरिया। पंडरिया विधानसभा क्षेत्र में उस वक्त विवाद गहरा गया, जब क्षेत्र के विधायक द्वारा थाना परिसर में जाकर सिपाही से लेकर थाना प्रभारी तक सभी पुलिसकर्मियों को लाइन में खड़ा कर सार्वजनिक रूप से फटकार लगाए जाने का मामला सामने आया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली बल्कि जनप्रतिनिधियों की संवैधानिक सीमाओं पर भी बहस छेड़ दी है।
कानूनी जानकारों के अनुसार, भारतीय संविधान और प्रचलित कानून किसी भी विधायक को पुलिस बल पर प्रत्यक्ष अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं देते। पुलिस विभाग राज्य शासन के अधीन होते हुए भी एक स्वतंत्र प्रशासनिक ढांचे में कार्य करता है, जिसकी कमान एसपी, डीआईजी और आईजी जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के हाथ में होती है।
विधायक जनहित से जुड़े मुद्दे उठा सकते हैं, थाने का निरीक्षण कर सकते हैं या शिकायत दर्ज करा सकते हैं, लेकिन पुलिसकर्मियों को लाइन में खड़ा करना, आदेशात्मक भाषा में बात करना या सार्वजनिक रूप से फटकार लगाना कानूनन अनुमत नहीं माना जाता।
सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की कार्यवाही पुलिस मैनुअल, सेवा नियमों और लोकतांत्रिक मर्यादा तीनों के खिलाफ है। अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार केवल विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों को है, न कि किसी जनप्रतिनिधि को।
संविधान का अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 पुलिसकर्मियों पर भी समान रूप से लागू होता है। सार्वजनिक रूप से अपमानजनक व्यवहार उनकी गरिमा और सम्मान के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है।
यदि विधायक को पुलिस कार्यप्रणाली से आपत्ति थी, तो उसके लिए उचित रास्ता पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत देना, गृह विभाग या गृह मंत्री को अवगत कराना अथवा प्रशासनिक बैठकों में मुद्दा उठाना था, न कि थाना परिसर में अनुशासनात्मक कार्रवाई जैसा व्यवहार करना।
सूत्रों के अनुसार, इस घटनाक्रम से पुलिस बल के मनोबल पर असर पड़ने की चर्चा है। प्रशासनिक हलकों में इसे राजनीतिक हस्तक्षेप का उदाहरण माना जा रहा है, जिससे कानून-व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इस मामले में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी संज्ञान लेंगे या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

