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केले की खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर

केले की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखी जा रही है. इससे किसानों को कुछ राहत मिली है. बढ़ती कीमतों से वे उत्पादन में आई गिरावट की कुछ हद तक भरपाई कर रहे हैं. लेकिन इससे कुछ ही किसानों को फायदा हो रहा है. कुछ दिन पहले ही प्री-मॉनसून बारिश (Monsoon Rain) की वजह जलगांव में केले के बागों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ था. महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में भी तेज आंधी और बारिश की वजह से बाग तबाह हो गए थे, जिसकी वजह केले के उत्पादन में भारी गिरावट देखी जा रही हैं. वहीं अब किसानों को केले का रिकॉर्ड रेट मिल रहा हैं, जिस तरह से कपास के मामले में दिखाया गया था अब ठीक वैसा ही केले (Banana)के मामले में हो रह है. आवक में कमी आने से भाव मे और भी बढ़ोतरी हो सकती है. केले का गढ़ माने जाने वाले जलगांव जिले और रावेर ब्लॉक केला उत्पादन के मामले में आगे है. सीजीन की शुरुआत में जो केला 300 से 400 रुपए क्विंटल था, अब बढ़कर 1,800 रुपए पर आ गया है. बाजार में उच्च मांग के बावजूद आपूर्ति में कमी देखी जा रही है. इस वर्ष प्रकृति की अनिश्चितता के कारण केला उत्पादन में कमी आई है. मराठवाड़ा समेत विदर्भ में भी बारिश की वजह से केले के बाग नष्ट हुए थे. केले के दाम दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं. सीजन की शुरुआत में व्यापारियों और किसानों के बीच दरों को लेकर कई बार मतभेद हो गया था, लेकिन अब तस्वीर बदल गई है. जिले के रावर बाजार समिति में 15 जून को 1,670 रुपए प्रति क्विंटल का भाव रहा. वहीं 14 जून को ठाणे में सबसे अधिक 4000 रुपए प्रति क्विंटल तक की कीमत मिली और अधिकतम रेट 4500 रुपए से ज्यादा मिला था. इसके अलावा सोलापुर में 1500 रुपए प्रति क्विंटल दाम है और पुणे में 2200 रुपए प्रति क्विंटल कीमत है. कीमतों में तेज वृद्धि के बावजूद किसान खुश नहीं हैं. उनका कहना है कि जब उत्पादन ही नहीं है तो बढ़ते दाम का लाभ कैसे मिलेगा, जिन किसानों के पास पहले से केला बचा होगा, उन्हें थोड़ा मुनाफा हो सकता है. केला एक बारहमासी फल है जो बाजार में हर समय उपलब्ध होता है. किसानों का कहना है कि सीजन की शुरुआत में ही व्यापारियों ने कम रेट देकर मनमानी शुरू कर दी. केला उत्पादकों का कहना है कि अंगूर की तरह केले की कीमत तय की जानी थी. व्यापारियों ने विभिन्न स्थानों पर किसानों को रोका था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है. केले खरीदने के लिए व्यापारी सीधे किसानों के खेत में जा रहे हैं.

 

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