CG NEWS: Supreme Court’s strictness, displeasure over long hearing, accused of Naxalite activities gets bail!
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए के तहत दर्ज मामलों की लंबी सुनवाई पर कड़ी नाराजगी जताई और दो कथित माओवादी समर्थकों को राहत दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि अनिश्चितकालीन कारावास संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
विशेष अदालतें बनाने पर जोर
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने माओवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया ताकि ऐसे मामलों में तेजी लाई जा सके।
छह साल से जेल में बंद आरोपी को राहत
पीठ ने मणिपुर से बिहार में गोला-बारूद और एके-47 राइफल के पुर्जे कथित रूप से ले जाने के आरोपी निंग खाम शंगतम के मामले में देरी को लेकर नाराजगी जताई। उनकी गिरफ्तारी के छह साल बाद भी 98 में से केवल 59 गवाहों से ही पूछताछ हो सकी है।
अदालत ने एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) से मुकदमे की सुनवाई तेज करने के निर्देश दिए और कहा कि बिहार की अदालत जहां यह मामला चल रहा है, वह नियमित मामलों की सुनवाई के कारण देरी से निपट रही है।
छत्तीसगढ़ में आरोपी तापस कुमार पालित को मिली जमानत
दूसरे मामले में न्यायमूर्ति जेपी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने छत्तीसगढ़ में नक्सली गतिविधियों से जुड़े तापस कुमार पालित को जमानत दे दी। उन पर जूते, बिजली के तार, एलईडी लेंस, वॉकी-टॉकी और अन्य सामान कथित रूप से नक्सलियों तक पहुंचाने का आरोप था।
पालित 24 मार्च 2020 से जेल में बंद थे और अब तक 100 से अधिक गवाहों में से केवल 42 की ही गवाही दर्ज हो पाई थी।
अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर किसी आरोपी को विचाराधीन कैदी के रूप में छह से सात साल तक जेल में रहना पड़ता है, तो यह त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने इन मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं।
इस फैसले से आतंकवाद और माओवाद से जुड़े मामलों में निष्पक्ष व त्वरित सुनवाई की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं।

