Millions of Indians are unaware that they are infected with hepatitis: Ramkrishna Care
रायपुर, 27 जुलाई : रोकथाम, जांच और इलाज की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद वायरल हेपेटाइटिस आज भी
दुनिया की सबसे अधिक उपेक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। इस वर्ष विश्व हेपेटाइटिस दिवस विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की थीम “हेपेटाइटिसः आइए, इसे समझें और हर बाधा दूर करें” के साथ मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य जांच, वैक्सीनेशन, इलाज और देखभाल तक पहुंच में मौजूद बाधाओं को दूर करने के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। WHO के अनुसार, वायरल हेपेटाइटिस से हर वर्ष लगभग 13 लाख लोगों की मृत्यु होती है और यह दुनिया में संक्रमण से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक है।
भारत आज भी हेपेटाइटिस से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है। डब्ल्यूएचओ और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी अनुमानों के अनुसार, देश में लगभग 2.9 करोड़ लोग क्रॉनिक हेपेटाइटिस-बी तथा करीब 55 लाख लोग क्रॉनिक हेपेटाइटिस-सी संक्रमण के साथ जीवन जी रहे हैं। अधिकांश संक्रमित लोगों को अपनी बीमारी का पता ही नहीं चलता, क्योंकि हेपेटाइटिस लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के चुपचाप लिवर को नुकसान पहुंचाता रहता है।
विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर रामकृष्ण केयर अस्पताल के विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में जागरूकता की कमी और देर से बीमारी की पहचान भारत में हेपेटाइटिस से होने वाली लिवर संबंधी गंभीर बीमारियों को रोकने में सबसे बड़ी चुनौती है। भारत सरकार के नेशनल वायरल हेपेटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन वर्ष 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरे के रूप में समाप्त करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जनजागरूकता बढ़ाना, नियमित स्क्रीनिंग को बढ़ावा देना और वैक्सीनेशन कवरेज बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है।
विशेषज्ञों ने बताया कि देश में लिवर रोगों का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। एक ओर फैटी लिवर डिजीज के मामले बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर क्रॉनिक हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी आज भी सिरोसिस, लिवर फेल्योर और लिवर कैंसर के प्रमुख कारण बने हुए हैं। बड़ी संख्या में मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब उन्हें पीलिया, पेट में पानी भरना, पाचन तंत्र से रक्तस्राव, लिवर फेल्योर के कारण मानसिक भ्रम या लिवर कैंसर जैसी गंभीर समस्याएं विकसित हो चुकी होती हैं। इस अवस्था में इलाज अधिक जटिल हो जाता है और अच्छे परिणाम मिलने की संभावना भी कम हो जाती है।
डॉ. संदीप पनेडी, सीनियर कंसल्टेंट एंड हेड, रामकृष्ण केयर अस्पताल, ने कहा, “आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हेपेटाइटिस को ‘साइलेंट डिजीज’ कहा जाता है, क्योंकि मरीज कई वर्षों तक पूरी तरह स्वस्थ दिखाई दे सकता है, जबकि वायरस धीरे-धीरे उसके लिवर को नुकसान पहुंचाता रहता है। हमारे पास कई मरीज तब पहुंचते हैं जब उन्हें सिरोसिस, लिवर फेल्योर या लिवर कैंसर हो चुका होता है। दूसरी ओर, बहुत से लोग मान लेते हैं कि लिवर की हर बीमारी फैटी लिवर या शराब के कारण होती है, जबकि क्रॉनिक हेपेटाइटिस-बी या हेपेटाइटिस-सी की पहचान ही नहीं हो पाती। डायबिटीज, मोटापा, पहले कभी ब्लड ट्रांसफ्यूजन, डायलिसिस, परिवार में लिवर रोग का इतिहास, हेल्थकेयर वर्कर्स तथा अन्य जोखिम वाले लोगों को बिना किसी लक्षण के भी हेपेटाइटिस की जांच जरूर करानी चाहिए।”
विशेषज्ञों ने बताया कि हेपेटाइटिस-ए और हेपेटाइटिस-ई आमतौर पर दूषित भोजन और पानी के माध्यम से फैलते हैं तथा विशेष रूप से मानसून के दौरान तीव्र संक्रमण का कारण बनते हैं। वहीं हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी संक्रमित रक्त, असुरक्षित इंजेक्शन, बिना स्टरलाइज किए गए मेडिकल या कॉस्मेटिक उपकरण, संक्रमित सुई साझा करने, असुरक्षित यौन संबंध और संक्रमित मां से प्रसव के दौरान शिशु तक फैल सकते हैं। चूंकि ये संक्रमण वर्षों तक बिना लक्षण के बने रह सकते हैं, इसलिए अधिकांश लोगों को बीमारी का पता तब चलता है जब लिवर को गंभीर क्षति पहुंच चुकी होती है।
डॉक्टरों ने सलाह दी कि लगातार थकान, बिना कारण कमजोरी, भूख कम लगना, मतली, गहरे रंग का पेशाब, आंखों या त्वचा का पीला पड़ना (पीलिया), अचानक वजन कम होना, पेट में सूजन या बार-बार पाचन संबंधी परेशानी जैसे लक्षणों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। वहीं जिन लोगों में जोखिम कारक मौजूद हैं, उन्हें लक्षण न होने पर भी साधारण ब्लड टेस्ट के माध्यम से हेपेटाइटिस की जांच करानी चाहिए, ताकि लिवर को स्थायी नुकसान होने से पहले बीमारी का पता लगाया जा सके।
डॉ. ललित निहाल, सीनियर कंसल्टेंट गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड हेपेटोलॉजी, रामकृष्ण केयर अस्पताल, ने कहा, “अच्छी बात यह है कि यदि समय रहते पहचान हो जाए तो आज हेपेटाइटिस से डरने की जरूरत नहीं है। हेपेटाइटिस-बी से वैक्सीनेशन के माध्यम से प्रभावी बचाव संभव है, जबकि हेपेटाइटिस-सी का इलाज अब आधुनिक एंटीवायरल दवाओं से अधिकांश मरीजों में सफलतापूर्वक किया जा सकता है। सबसे बड़ी बाधा आज भी जागरूकता की कमी है, जिसके कारण बीमारी का पता देर से चलता है। यदि लिवर को नुकसान होने से पहले साधारण ब्लड टेस्ट कर लिए जाएं तो सिरोसिस, लिवर कैंसर और यहां तक कि लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत को भी टाला जा सकता है। वर्ष 2030 तक हेपेटाइटिस निवारण उन्मूलन का लक्ष्य तभी संभव है, जब विशेष रूप से उच्च जोखिम वाले लोगों के लिए स्क्रीनिंग को नियमित प्रिवेंटिव हेल्थकेयर का हिस्सा बनाया जाए।”
विशेषज्ञों ने हेपेटाइटिस-बी के सार्वभौमिक वैक्सीनेशन, नवजात शिशुओं को जन्म के तुरंत बाद वैक्सीन की पहली डोज देने, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, सुरक्षित इंजेक्शन पद्धति, ब्लड की अनिवार्य स्क्रीनिंग तथा अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण के उच्च मानकों का पालन करने पर भी जोर दिया। उन्होंने लोगों से रेजर, टूथब्रश और सुई जैसी व्यक्तिगत वस्तुएं साझा न करने, टैटू या पियर्सिंग केवल स्टरलाइज उपकरणों से कराने तथा स्वच्छ भोजन और साफ-सफाई की आदतें अपनाने की अपील की।
विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर रामकृष्ण केयर अस्पताल के विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की कि वे लक्षण आने का इंतजार न करें और समय रहते चिकित्सकीय सलाह लें। उन्होंने दोहराया कि वायरल हेपेटाइटिस पूरी तरह रोके जाने योग्य और उपचार योग्य बीमारी है तथा समय पर पहचान ही लिवर फेल्योर, लिवर कैंसर और अनावश्यक मृत्यु से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है। भारत यदि वर्ष 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरे के रूप में समाप्त करना चाहता है, तो जनजागरूकता, समय पर वैक्सीनेशन, नियमित स्क्रीनिंग और विशेषज्ञ लिवर उपचार तक शीघ्र पहुंच को प्राथमिकता देनी होगी।
डॉ. हितेश कुमार दुबे, सीनियर कंसल्टेंट लिवर ट्रांसप्लांट एंड एचपीबी सर्जरी, रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल्स “हर साल हेपेटाइटिस बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के लाखों लोगों के लिवर को धीरे-धीरे नुकसान
पहुंचाता है। अक्सर जब तक इसके लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है। एक लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन के रूप में मैं प्रत्यक्ष रूप से देखता हूं कि समय पर पहचान और इलाज नहीं होने पर वायरल हेपेटाइटिस सिरोसिस, लिवर फेलियर और लिवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। अच्छी बात यह है कि हेपेटाइटिस से बचाव संभव है और कई मामलों में इसका सफल इलाज भी किया जा सकता है। समय पर जांच, हेपेटाइटिस-बी का टीकाकरण और शुरुआती चिकित्सा उपचार न केवल लोगों की जान बचा सकते हैं, बल्कि लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यकता को भी टाल सकते हैं। लिवर ट्रांसप्लांट मरीज को जीवन का दूसरा अवसर देता है, लेकिन बचाव और समय पर निदान ही हमारे सबसे प्रभावी हथियार हैं। विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर आइए, जागरूकता फैलाएं, समय पर जांच कराएं और अपने लिवर की सुरक्षा करें, क्योंकि स्वस्थ लिवर ही स्वस्थ जीवन की मजबूत नींव है।”
