कवर्धा। छत्तीसगढ़ का वीवीआईपी कबीरधाम जिला इन दिनों किसी विकास मॉडल या जनकल्याणकारी योजना को लेकर नहीं, बल्कि “मुसुवा मॉडल ऑफ इकॉनमिक्स फॉर अर्निंग ब्लैक मनी” को लेकर देशभर में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। मामला कोई छोटा-मोटा नहीं, बल्कि करीब 7 करोड़ रुपये के धान (20 से 25 हजार क्विंटल) के कथित तौर पर मुसुवा (चूहा) द्वारा खा जाने का है।
अगर यह दावा सच मान लिया जाए, तो यह कोई साधारण मुसुवा नहीं, बल्कि ऐसा विशेष प्रशिक्षित मुसुवा है, जो सरकारी फाइलें पढ़ता है, कस्टम मिलिंग, ट्रांसपोर्टिंग टेंडर, सुखत और तौल की गणित समझता है और मौका देखकर वार करता है।
शुरुआत में मौन, फिर अचानक कार्रवाई
मामले के सामने आते ही शुरुआत में साहब और अफसर मौनव्रत पर रहे। मीडिया सवाल पूछती रही, कैमरे-माइक आगे बढ़ते रहे, लेकिन जवाब में हंसी-मजाक और “बिना बाइट के खबर चल जाएगी क्या?” जैसे तंज सुनने को मिले।
लेकिन जैसे ही सवाल उठा कि इतना धान खाने वाला मुसुवा आखिर कौन है? और इस गैंग का सरदार कौन?—वैसे ही फाइलों में हलचल मच गई, कुर्सियां खिसकने लगीं, नोटिस उड़ने लगे और निलंबन ऐसे होने लगे मानो नियम अचानक याद आ गए हों।
कद्दू कटेगा तो सबमें बंटेगा!
कबीरधाम का यह मुसुवा कांड उस कहावत को चरितार्थ करता दिख रहा है—
“कद्दू कटेगा तो सब में बंटेगा।”
यानि मौका बड़ा हो तो हिस्सेदारी भी सामूहिक होती है। आज के दौर में फर्क बस इतना है कि बकरा जनता होती है और मुहल्ला खास लोग।
धान सरकारी था, गोदाम सरकारी था, जिम्मेदारी सरकारी थी, लेकिन जब धान गायब हुआ तो अपराध प्राकृतिक हो गया और आरोपी मुसुवा। सवाल यह नहीं कि मुसुवा ने खाया या नहीं, सवाल यह है कि मुसुवा को चाबी किसने दी? क्योंकि गोदाम के ताले अपने आप नहीं खुलते, रजिस्टर खुद नहीं बदलते और वजन अपने आप कम नहीं होता।
मुसुवा नहीं, पूरा गैंग!
जांच बैठेगी तो सामने आएगा कि यह अकेला मुसुवा नहीं था, बल्कि पूरा मुसुवा गैंग था—कहीं चुप्पी, कहीं लापरवाही, कहीं मिलीभगत और कहीं “ऊपर से आदेश है” वाला जुमला। अब चर्चा इस बात की है कि इस गैंग का सरदार कौन है? और कद्दू आखिर किन-किन हाथों में बंटा।
जनता की थाली खाली, सिस्टम मलाई में
आरोप है कि लिफाफों के वजन से मामला दबाने की कोशिश हो रही है— कोई चुप रहे, कोई बच जाए, कोई निलंबित होकर बहाली का जुगाड़ कर ले, कोई पदोन्नति पा जाए और जनता? वह हमेशा की तरह कनकी युक्त चावल के लिए राशन दुकान की लाइन में खड़ी रहे, जबकि हिस्से में सिर्फ खाली कढ़ाही आए। असली सवाल समस्या मुसुवा नहीं है, समस्या वह कद्दू है जो कटता तो है, लेकिन बंटता सिर्फ चुनिंदा हाथों में है।अब बड़ा सवाल
यही है—
मुसुवा की आड़ में यह घपला आखिर कहां तक पहुंचा? और सिस्टम की दीवार में वह सुराख किसने किया, जिससे दफ्तर की बातें आज बाजार तक आ गईं?

