Liquor Scam Case: नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को प्रवर्तन निदेशालय (ED) से जवाब मांगा है। चैतन्य बघेल ने शराब घोटाले के सिलसिले में अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने ईडी को नोटिस जारी किया और दस दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि मामला केवल गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि बीएनएसएस, 2023 की धारा 190 की व्याख्या से जुड़ा है — “आप जांच में कितना समय ले सकते हैं?”
ईडी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही उन्हें तीन महीने में जांच पूरी करने का समय दिया है।
चैतन्य बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और एन. हरिहरन ने दलील दी कि ईडी जानबूझकर जांच को लंबा खींच रही है ताकि उनके मुवक्किल की हिरासत बढ़ती रहे।
हरिहरन ने कहा, “जांच का कोई अंत दिखाई नहीं दे रहा है। हमने हाई कोर्ट में गिरफ्तारी के आधार को रद्द करने की मांग की थी।”
सिब्बल ने कहा, “ईडी ने मेरे मुवक्किल को ‘असहयोग’ के आधार पर गिरफ्तार किया, जबकि उन्होंने कभी नोटिस नहीं भेजा, न तलब किया। बिना नोटिस दिए धारा 19 (पीएमएलए) के तहत गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।”
इस पर जस्टिस कांत ने कहा, “असहयोग ही गिरफ्तारी का एकमात्र आधार नहीं है।”
सिब्बल ने जवाब में कहा, “यह आरोप हैं, लेकिन असल मुद्दा यही है कि ईडी ने बिना अदालत की अनुमति के जांच की और मुकदमे में देरी की।”
गौरतलब है कि 2,000 करोड़ रुपये से अधिक के शराब घोटाले में राजनेताओं, आबकारी अधिकारियों और निजी ऑपरेटरों पर 2019 से 2022 के बीच राज्य के शराब व्यापार में हेरफेर करने का आरोप है।
चैतन्य बघेल पर भी फर्जी कंपनियों और रियल एस्टेट निवेशों के जरिए अपराध की आय को वैध बनाने का आरोप है।
इससे पहले, 17 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने माना कि ईडी ने बिना अनुमति के जांच की, लेकिन इसे “केवल प्रक्रियागत अनियमितता” बताया था।
इसके अलावा, चैतन्य बघेल ने एक अलग याचिका में पीएमएलए की धारा 50 और 63 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। उन्होंने कहा है कि ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 20(3) और 21 का उल्लंघन करते हैं, क्योंकि ये ईडी को ऐसे बयान दर्ज करने का अधिकार देते हैं जो आत्म-दोष (Self-Incrimination) के खिलाफ सुरक्षा का हनन करते हैं।

