BILASPUR POLITICS : कभी था दबदबा, अब कैबिनेट में प्रतिनिधित्व शून्य …

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BILASPUR POLITICS : Once there was dominance, now representation in the cabinet is zero…

बिलासपुर। अविभाजित मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के शुरुआती दौर तक बिलासपुर की राजनीति का राज्य मंत्रिमंडल में खास दबदबा रहा है। श्रीधर मिश्रा, चित्रकांत जायसवाल, बीआर यादव, राजेंद्र प्रसाद शुक्ला और अशोक राव जैसे कद्दावर नेताओं ने अपनी मजबूत पकड़ से जिले को राजनीतिक पहचान दिलाई। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी का भी राजनीतिक सफर बिलासपुर से ही शुरू हुआ और उनके दौर में बिलासपुर का सियासी रसूख चरम पर रहा।

राजनीतिक जानकार बताते हैं कि 2008 से 2013 तक रमन सिंह सरकार के समय भी जिले का प्रभाव बरकरार रहा, लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव ने समीकरण पूरी तरह बदल दिए। बिलासपुर जिले की सियासी पकड़ सत्ता और संगठन दोनों में कमजोर हो गई। तखतपुर की विधायक रश्मि सिंह को संसदीय सचिव का दर्जा जरूर मिला, लेकिन कैबिनेट स्तर पर बिलासपुर की उपस्थिति शून्य रही।

भाजपा शासन के दौरान राजनीति अमर अग्रवाल, धरमलाल कौशिक और पुन्नूलाल मोहले जैसे नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन अब हालात एकदम उलट हैं। डिप्टी सीएम अरुण साव ने बिलासपुर में निवास और सक्रियता बढ़ाई, मगर वे मुंगेली जिले से आते हैं और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता सीमित रही।

बीजेपी के पास बिलासपुर से धरमलाल कौशिक, धर्मजीत सिंह और सुशांत शुक्ला जैसे विकल्प मौजूद हैं, लेकिन जिले को मंत्रिमंडल में कोई जगह नहीं मिली। सवाल यह उठता है कि कभी राज्य की राजनीति की धुरी रहा बिलासपुर अब नेतृत्वहीन क्यों है? और आम जनता अपनी समस्याओं के लिए आखिर किसके पास जाएगी?

 

 

 

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