कवर्धा जिले में इन दिनों पीडब्ल्यूडी विभाग में टेंडर का सूखा पड़ा हुआ है। हालात ऐसे हैं कि कोई भी ठेकेदार अब विभाग के टेंडर में हिस्सा लेने को तैयार नहीं है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, आईई के ट्रांसफर के बाद विभाग की कार्यप्रणाली पूरी तरह ठप जैसी हो गई है।
जानकार बताते हैं कि पहले जहां ठेकेदारों की लाइन लगी रहती थी, अब वहां सन्नाटा पसरा है। वजह बताई जा रही है — “न तो भुगतान समय पर हो रहा है, न फाइल आगे बढ़ रही है।” ऊपर से अफसरों की मनमानी, कमीशनखोरी और डर का माहौल ने ठेकेदारों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है।
ठेकेदारों का कहना है कि बिना जेब खाली किए कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती। “काम करो तो भुगतान अटका, और आवाज उठाओ तो ब्लैकलिस्टिंग का डर!” — एक स्थानीय ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया।
ट्रांसफर होने के बाद ऐसा क्या हुआ के ट्रांसफर रुक गया इन्हें मंत्री जी से अंग्रेजी में क्या ऐसा बोला कि लोगों को वहां खड़े लोगों को कुछ समझ में नहीं आया
कवर्धा पीडब्ल्यूडी में इन दिनों यह चर्चा आम है कि ईई के ट्रांसफर के बाद “रिश्ते और रफ्तार दोनों ठप” हो गए हैं। फाइलों की ढेर, भुगतान में देरी, और अफसरों की ‘एक साइड नीति’ से ठेकेदार परेशान हैं। कई ठेकेदारों ने तो खुलकर कहा है —
> “अब पीडब्ल्यूडी में काम करना मतलब खुद का नुकसान मोल लेना।”
अब सवाल यह है कि आखिर पीडब्ल्यूडी में ऐसा माहौल क्यों बना? क्या विभाग के बड़े अफसर सब जानते हुए भी आंख मूंदे बैठे हैं? या फिर कोई “सिस्टमेटिक गेम” चल रहा है जिससे ठेकेदारों को बाहर किया जा रहा है?
जिले में यह मामला अब चर्चा का विषय बन चुका है —
“कवर्धा में टेंडर ठप, ठेकेदार गुम, अफसर गुमनाम!”
जनता सवाल पूछ रही है — क्या पीडब्ल्यूडी में सुधार होगा या विभाग ऐसे ही सुस्त पड़ा रहेगा?

