तिरछी नजर : 6 सौ करोड़ लैप्स होने के कगार पर…

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निर्माण कार्यों के लिए पैसे की कमी का रोना रोया जाता है। मगर कई विभागों में पैसा खूब है, लेकिन लालफीताशाही के चलते कामकाज ठप हैं । अब नवा रायपुर को ही देख लीजिए ,केन्द्र सरकार ने 8 सौ करोड़ स्मार्ट सिटी के मद में निर्माण कार्यों के लिए भेजा था जिसमें से 6 सौ करोड़ लैप्स होने के कगार पर है। मई 2023 तक लगभग 15 बड़े काम को पूरा करना है। टेण्डर की प्रक्रिया भी मार्च 2022 तक पूरा कर लिया गया है और सिर्फ 20 प्रतिशत ही अभी तक काम हुआ है। इस बीच 3 महीने में एनआरडीए के तीन सीईओ बदल गए हैं। एक सीईओ को पक्षपात तरीके से काम करने के कारण चलता किया गया। कुल मिलाकर नवा रायपुर का बुरा हाल है ।

अग्रवाल सभा में भी छत्तीसगढिय़ावाद…

अग्रवाल सभा के चुनाव में इस बार छत्तीसगढिय़ावाद हावी रहा। दशकों बाद हुए अग्रवाल सभा के चुनाव में विधायक, मंत्री व उद्योगपतियों की रूचि होने के कारण सुर्खियों में रहा। तेजी से पैसा कमाने वाले अग्रवाल समाज के एक प्रभावशाली नेता को चुनाव अधिकारी ने बताया कि आप जब रायपुर आए थे तब हमारे दो धर्मशाला थे। सामाजिक ताना-वाना पूरे छत्तीसगढ़ में फैला है। हम छत्तीसगढिय़ों को चुनाव मेंबर बेदखल नहीं किया जा सकता। इसके बाद विजय अग्रवाल को सिर्फ इसलिए अध्यक्ष चुने गए कि उनके पक्ष पुराने स्थानीय अग्रवाल एकजुट थे ।

ठाकुरों की चल रही
छत्तीसगढ़ भाजपा में 15 साल तक सौदान सिंह और डॉक्टर रमन सिंह की जोड़ी काबिज रही। सौदान सिंह तो प्रदेश से चले गए, लेकिन उनका दबदबा कायम है। दोनों से नाखुश रहने वाले लोग या तो लोग पार्टी से बेदखल हो गए या हासिए पर ढकेल दिए गए। विधानसभा चुनाव हार के बाद हाईकमान ने प्रदेश में बदलाव तो किए हैं, लेकिन इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। सौदान सिंह पर्दे के पीछे से कई मामलों पर अभी भी सलाह दे रहे है। यही नहीं, सौदान की जगह आए अजय जामवाल भी ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे हैं। जामवाल का फोन भी उसी (मिथलेश) के पास रहता है, जो कि सौदान सिंह के आंखों के तारे थे। यानी सारी बातें सौदान सिंह तक वैसे ही पहुंचती है। जाति समीकरण के नजरिए से देखा जाए, तो सौदान सिंह, रमन सिंह, शिव प्रकाश और अजय जामवाल भी राजपूत हैं। ऐसे में किसी और के दबदबे का सवाल ही पैदा नहीं होता।
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पूर्व विधायकों की सक्रियता
भारतीय जनता पार्टी के पराजित विधानसभा प्रत्याशियों की बैठक में संगठन के बड़े नेताओं ने कहा कि आप लोग अपने क्षेत्र में काम करिए जनता के बीच अगर आपकी मांग रहेगी तो कोई नकार नहीं पाएगा। पूर्व विधायकों ने संगठन के बड़े नेताओं के ऑफ द रिकार्ड इस चर्चा के बाद क्षेत्र में सक्रियता बढ़ा दी हैं। अब भाजपा में परिवर्तन की चर्चा के बीच रिकार्ड मतों से हारने वाले दमदार नेताओं ने भी दौरा शुरू कर दिया है। अब देखना यह है कि पैसा खर्च कराने की नीयत से कहा गया है, या फिर पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए। सारी स्थिति तो टिकट बंटने के बाद ही साफ होगी। फिलहाल तो सेठों ने थैली खोल दी है और माहौल बनाने में जुटे हैं।
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कर्मचारी नेताओं में घमासान
कर्मचारी आंदोलन के खत्म होने के बाद घमासान तेज हो गया है। आंदोलन के दौरान कमाऊ विभाग के अधिकारी-कर्मचारी बिना मुख्यालय छोडऩे की अनुमति लिए लंबी-लंबी यात्रा पर बगैर सैर सपाटे के लिये निकल गये थे। कई संघ के आंदोलन में वापस आने पर जोरदार विवाद चल रहे हैं। कई प्रमुख पदाधिकारी को हटाने की मुहिम भी शुरू करने की बैठकें चल रही है। अब मांग पूरा होने की तिथि का इंतजार हर किसी को है।
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हिंदुत्व कार्ड से सहमे कदम
भाजपा के हिंदुत्व कार्ड से डरे हुए कांग्रेस के एक संसदीय सचिव ने दिल्ली जाकर हाईकमान से अनुरोध किया है कि आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान अल्प संख्यक वर्ग के नेताओं को ज्यादा तवज्जों देने से भाजपा को जबरिया चुनावी मुद्दा मिल जाएगा, इसलिए जीतने की क्षमता रखने वाले सौम्य अल्प संख्यक वर्ग के नेताओं को ही टिकट देने के बारे में विचार किया जाए। इस नेता ने और कई गतिविधियों की तरफ भी ध्यान आकृष्ट कराया।

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