SUPREME COURT SIR CASE : Mamata turns lawyer
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में नया इतिहास रच सकती हैं। अगर अदालत से अनुमति मिलती है, तो वह अपनी ही याचिका पर खुद बहस करने वाली देश की पहली मौजूदा मुख्यमंत्री होंगी। मामला चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल में कराई जा रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़ा है, जो मतदाता सूची में बदलाव को लेकर विवादों में है।
ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी हैं और इसे देखते हुए कोर्ट परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। PTI के मुताबिक मुख्यमंत्री ने अपनी याचिका में मांग की है कि राज्य में चल रही पूरी SIR प्रक्रिया को रद्द किया जाए और 2026 के विधानसभा चुनाव 2025 की मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर कराए जाएं।
ममता बनर्जी का कहना है कि SIR के नाम पर बड़ी संख्या में सही मतदाताओं के नाम काटे जा सकते हैं, जिससे आम लोगों का वोट देने का अधिकार छिनने का खतरा है। उन्होंने चुनाव आयोग के 24 जून 2025 और 27 अक्टूबर 2025 के आदेशों को रद्द करने की मांग की है।
मुख्यमंत्री ने याचिका में कहा है कि 2002 की पुरानी मतदाता सूची को आधार बनाकर जांच करना और सख्त नियम लागू करना आम लोगों के लिए परेशानी बन गया है। नाम की मामूली गलती, उम्र या माता-पिता के नाम में अंतर जैसे कारणों से मतदाताओं को नोटिस भेजे जा रहे हैं।
ममता बनर्जी ने अदालत से मांग की है कि ऐसे मामलों में सुनवाई रोकी जाए और चुनाव अधिकारी खुद रिकॉर्ड देखकर सुधार करें। उन्होंने आधार कार्ड को पहचान का मान्य दस्तावेज मानने और मतदाताओं से बार-बार अतिरिक्त कागजात न मांगने की भी अपील की है।
यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया को लेकर आम लोगों की परेशानी पर चिंता जताई थी। अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिए थे कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, सरल और मतदाता-हितैषी होनी चाहिए। कोर्ट ने साफ कहा था कि किसी भी योग्य मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं कटना चाहिए।
इसी बीच चर्चा इस बात की भी है कि क्या ममता बनर्जी खुद कोर्ट में बहस कर सकती हैं। ममता बनर्जी ने कानून की पढ़ाई की है और उनके पास LLB की डिग्री है। हालांकि, Advocates Act, 1961 के मुताबिक सिर्फ LLB होना काफी नहीं है। वकील के तौर पर बहस करने के लिए राज्य बार काउंसिल में पंजीकरण, ऑल इंडिया बार एग्जाम पास करना और Certificate of Practice होना जरूरी है।
इन प्रक्रियाओं को पूरा न करने के कारण ममता बनर्जी कानूनी रूप से प्रैक्टिसिंग एडवोकेट नहीं मानी जातीं। ऐसे में वह याचिकाकर्ता के रूप में कोर्ट में मौजूद रह सकती हैं, कार्यवाही देख सकती हैं और अपने वकीलों को निर्देश दे सकती हैं, लेकिन खुद जज के सामने कानूनी दलीलें नहीं रख सकतीं।
अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है कि क्या वह ममता बनर्जी को खुद बोलने की अनुमति देता है या नहीं।

