CHANDRAYAAN 4 : चंद्रयान-4 के लिए साउथ पोल साइट तय

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CHANDRAYAAN 4 : South Pole site finalised for Chandrayaan-4

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान-4 मिशन के लिए चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में सुरक्षित लैंडिंग साइट की पहचान कर ली है। स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (SAC) के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर से मिली 32 सेंटीमीटर हाई-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरों का विश्लेषण कर मॉन्स मूटन (Mons Mouton) पर्वत के पास करीब 1 वर्ग किलोमीटर का पैच सबसे उपयुक्त पाया है।

चंद्रयान-4 भारत का पहला लूनर सैंपल रिटर्न मिशन होगा यानी चांद की मिट्टी और पत्थर इकट्ठा कर उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना। मिशन में प्रोपल्शन मॉड्यूल, डिसेंडर मॉड्यूल, एसेंडर मॉड्यूल, ट्रांसफर मॉड्यूल और री-एंट्री मॉड्यूल शामिल होंगे। लक्ष्य है सॉफ्ट लैंडिंग, सैंपल कलेक्शन, उन्हें चंद्र कक्षा में भेजना और फिर सुरक्षित पृथ्वी वापसी। सफलता मिली तो भारत अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों की कतार में शामिल हो जाएगा।

लैंडिंग साइट क्यों अहम है?

दक्षिणी ध्रुव इलाका बेहद खुरदरा है गहरे गड्ढे, बड़े पत्थर और असमान सतह। इसलिए इसरो ने सख्त मानक तय किए :

ढलान 10 डिग्री से कम

पत्थर 0.32 मीटर से छोटे

11-12 दिन पर्याप्त धूप (सोलर पावर के लिए)

पृथ्वी से मजबूत रेडियो संपर्क

न्यूनतम जोखिम

शुरुआत में कई संभावित जगहें चिन्हित की गईं। बाद में मॉन्स मूटन के आसपास पांच जोन पर फोकस किया गया। एक जोन लगातार अंधेरे में रहने के कारण बाहर कर दिया गया। बाकी चार—MM-1, MM-3, MM-4 और MM-5 की ढलान, ऊंचाई और 24×24 मीटर के सुरक्षित ग्रिड के आधार पर तुलना हुई।

सबसे आगे MM-4

खतरे का स्तर : 9.89% (सबसे कम)

औसत ढलान : 5 डिग्री

सुरक्षित ग्रिड : 568 (सबसे ज्यादा)

पर्याप्त रोशनी की उपलब्धता

इसके मुकाबले MM-1 और MM-3 में खतरा 12% से अधिक रहा, जबकि MM-5 में सिर्फ 72 सुरक्षित ग्रिड मिले। क्षेत्र की ऊंचाई 4800 से 6100 मीटर के बीच है।

वैज्ञानिकों अमिताभ, के. सुरेश, अजय के. प्रशर, कन्नन वी. अय्यर, अब्दुल एस., श्वेता वर्मा त्रिवेदी और नितांत दुबे—की टीम ने OHRC कैमरे की बारीक तस्वीरों के आधार पर यह अध्ययन किया। अब लैंडिंग साइट सिलेक्शन कमेटी की मंजूरी के बाद अंतिम फैसला होगा।

अगर चंद्रयान-4 सफल होता है, तो दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में मौजूद संभावित बर्फ और संसाधनों पर भारत की सीधी वैज्ञानिक पकड़ बनेगी। इसे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की अब तक की सबसे जटिल और महत्वाकांक्षी छलांग माना जा रहा है।

 

 

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